25 अक्टूबर, वर्ष 2013 हिन्दू कॉलेज ऑडिटोरियम में गुलज़ार की पहली झलक। सफेद झक कुरता और पायजामा। चेहरे पर मुस्कान और मृदुभाषी। हिन्दी और उर्दू के साफ उच्चारण। कहीं से पंजाबीपन की झलक तक नहीं। गुलजार से मिलो तो ऐसा लगता है कि मिलते रहो। बातों का सिलसिला कभी खत्म न होने पाए। हिन्दी सिनेमा में फिल्मकार-गीतकार-संवाद लेखक और साहित्यकार गुलज़ार जैसा व्यक्तित्व रखने वाले अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं।
गुलजार इस समय 79 वर्ष के हैं और अभी भी अपने काम के जरिए नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं। दादा साहेब फाल्के पुरस्कार इसकी मिसाल है। दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, भारत सरकार की ओर से दिया जाने वाला एक वार्षिक पुरस्कार है, जो किसी व्यक्ति विशेष को भारतीय सिनेमा में उसके आजीवन योगदान के लिए दिया जाता है | इस पुरस्कार का प्रारंम्भ दादा साहेब फाल्के के जन्म शताब्दी वर्ष 1969 से हुआ | पुरस्कार के तहत स्वर्ण कमल, 10 लाख रुपए की राशि और शॉल प्रदान किया जाता है। वर्ष 2013 के लिए गुलजार को दिया जाने वाला यह 45वां सम्मान है।
आजादी के पहले के भारत में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 1934 में जन्मे गुलजार का नाम संपूर्ण सिंह कालरा है। उनका परिवार विभाजन के दौरान अमृतसर आ गया लेकिन गुलजार बंबई गए और गैराज मैकेनिक के तौर पर काम शुरू कर दिया। इस दौरान उन्होंने खाली वक्त में कविताएं लिखना जारी रखा। गीतकार के रूप में उनके फिल्मी सफ़र की शुरुआत 1956 में बिमल राय की ‘बंदिनी’ से हुई। गुलजार ने हिंदी फिल्मों के अनेक संगीतकारों के साथ काम किया है। उन्होंने गीतकार के रूप में ही नहीं कई फिल्मों में पटकथा, कथा और संवाद लेखक के रूप में भी योगदान दिया।
‘तुझसे नाराज नहीं ज़िंदगी’ और ‘तेरे बिना जिंदगी से’ जैसे अनगिनत यादगार गीत लिखने वाले गुलजार ‘आंधी’, ‘मौसम’ ‘मेरे अपने’, ‘कोशिश’, ‘खुशबू’, ‘अंगूर’, ‘लिबास’ और ‘माचिस’ जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं।गुलजार ने बतौर निर्देशक अपना सफर 1971 में 'मेरे अपने' से शुरू किया। 1972 में आयी संजीव कुमार और जाया भादुड़ी अभिनीत फिल्म 'कोशिश' जो एक गूंगे बहरे दम्पति के जीवन पर आधारित कहानी थी, ने आलोचकों को भी हैरान कर दिया। इसके बाद गुलजार ने संजीव कुमार के साथ आंधी(1975), मौसम(1975), अंगूर(1981) और नमकीन(1982) जैसी फिल्मे निर्देशित की। करीब चार दशकों से भारतीय सिनेप्रेमियों को अपने गीतों से गुदगुदाने वाले मशहूर गीतकार गुलज़ार ने ‘मेरे अपने’ के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक अलग-अलग विषयों पर लीक से हटकर वे फिल्में बनाते रहे। ‘कोशिश’ फिल्म में गूँगे-बहरे माता-पिता की इच्छा है कि उनका बेटा उन जैसा नहीं हो। ‘आँधी’ फिल्म में इंदिरा गाँधी के जीवन की एक झलक है। मौसम, किनारा, खुशबू, अंगूर, नमकीन, इजाजत, लेकिन, लिबास और माचिस जैसी फिल्मों में उन्होंने इंद्रधनुषी रंग बिखेरे हैं।
29 वर्ष की आयु में 'मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे' जैसा परिपक्व गीत लिखने वाले गुलज़ार 75 वर्ष की आयु में 'कजरारे कजरारे' , 'बीड़ी जलइले जिगर से पिया' और 'कमीने' जैसे गीत भी लिखते हैं , यह उनकी जवाँ दिली को दर्शाता है। गुलज़ार साहब ने खुले मन से बदलते आधुनिक परिवेश को अपनाया है , यही कारण है कि युवा वर्ग भी उनके गीतों पर थिरकता है। युवा वर्ग की पसंद के नाम पर उन्होंने फूहड़ता को नहीं अपनाया। गुलज़ार के गीत भावुकता व संवेदनाओं से भरे होते हैं , स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियां गुलज़ार की अपनी विशेषता है, उनके फ़िल्मी गीत कथानक के ताने-बाने में बुने होते हैं। गुलज़ार के गीतों का दर्शन है- कोई रिश्ता कभी ख़त्म नहीं होता, कोई रिश्ता कभी मरता नहीं है। संगीतकार आरडी बर्मन और गुलज़ार की जुगलबंदी ने अनेक हिट गीतों को जन्म दिया जो आज भी चाव से सुने जाते हैं।
उनके गीतों में अमीर खुसरो और ग़ालिब की-सी मिठास है यही कारण है कि वर्ष 2002 में उन्हें साहित्य अकादमी तथा 2004 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। वे अब तक 20 फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। इतना ही नहीं उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्लमडॉग मिलियेनर फिल्म के लिए लिखे गीत 'जय हो' के लिए अकेडमी अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसी गीत के लिए आगे चलकर ग्रैमी अवार्ड दिया गया। गुलजार ने कई गीत लिखे हैं और कोई भी गीत कमजोर नहीं लगता। उनके हर गीत शब्दों के मामले में धनवान है। उनकी कल्पनाएं विस्मित करती हैं। शब्दों से खेलना भी वे अच्छी तरह जानते हैं। उनके गीत हिंदी फिल्मों की गीत परंपरा में अपनी पहचान खुद हैं। अगर हिन्दी सिनेमा जगत में किशोर कुमार के बाद किसी को संगीत और गाने के साथ विभिन्न और सफल प्रयोग करने के लिए जाना जाता है तो वह हैं गुलजार। गुलजार के काम को हम उनके अवार्डों और पुरस्कारों से जोड़कर नहीं देख सकते। हिन्दी सिनेमा में उन्होंने अभूतपूर्व सहयोग दिया है। उम्मीद है कि गुलजार इसी तरह बॉलिवुड के गीतों को गुलजार करते रहेंगे।
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| 25 अक्टूबर, वर्ष 2013 हिन्दू कॉलेज ऑडिटोरियम में गुलज़ार की पहली झलक |
सन्दर्भ:
-विकीपीडिया गुलज़ार
-विकीपीडिया दादासाहेब फाल्के पुरस्कार
-द टाइम्स ऑफ इंडिया
-बीबीसी हिंदी न्यूज

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