Tuesday, 16 December 2014

मित्र शशि की स्मृति में- 3

 स्नातक विदाई समारोह, वर्ष 2012 

याद! याद! याद !

आज जब मैं सोचती हूँ तो पाती हूँ कि मेरे जीवन में उन लोगों की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण रही है जिनके साथ संबंधों की शुरुआत असहमतियों से हुई। यथासंभव असहमतियों को खुले मन से स्वीकार करती हूँ , नए और अपने से भिन्न विचारों पर ईमानदारी से विचार करती हूँ। ऐसे व्यक्तियों को याद करते हुए ज़हन में जो पहला नाम आया वो तुम हो। अनंत असहमतियों के बाद जब हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते थे कि हम एक ही प्रकार के विचार का समर्थन कर रहे हैं। पर कितने अलग और कितने तर्कसंगत ढंग से तुम अपनी बात स्थापित करते थे। यूँ तो तुम्हे याद करने के लिए किसी ख़ास अवसर की जरूरत नहीं , शायद ही कोई क्षण ऐसा हो जब तुम मेरे मन में नहीं होते हो। पर कभी कभी विशेष रूप से तुमसे बातें करने की इच्छा प्रबल हो उठती है , तुम्हें सामने देखने को दिल चाहता है तुम्हारा हँसता-मुस्कुराता चेहरा आँखों के सामने आ जाता है। हमारा योजना-आयोग तो ध्वस्त हो गया , लौट आओ !

हमारे सपने अभी शेष हैं.… संभावनाएं समाप्त नहीं हुई हैं, बहुत कुछ थोड़ा-थोड़ा बचा है। उस थोड़े को ही अब संवारना है। साथ बने रहना।

संग - साथ , वर्ष 2012 

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