Tuesday, 16 December 2014

खलनायकी के नायक सदाशिव अमरापुरकर


पिछले दिनों सिनेमा जगत के 64 वर्षीय मशहूर खलनायक सदाशिव अमरापुरकर के निधन के समाचार ने स्तब्ध कर दिया। खलनायकी का यह सिलसिला के.एन.सिंह, प्रेमनाथ, प्राण, अमजद खान से शुरू होकर अमरीश पुरी, सदाशिव अमरापुरकर पर आकर ठहर गया। इन हस्तियों ने खलनायक के स्तरीय एवं बहुआयामी चेहरे प्रस्तुत किए, जो आज हिन्दी सिनेमा में मानक बन गए हैं।

11 मई 1950 को महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार में जन्में सदाशिव अमरापुरकर मराठी व हिंदी सिनेमा के मशहूर खलनायक रहे हैं। 64 वर्षीय अमरापुरकर का 3 नवम्बर 2014 को फेफड़ों में संक्रमण के कारण मुंबई में निधन हो गया। अमरापुरकर ने अपने अभिनय सफ़र की शुरुआत मराठी थिएटर से की , तकरीबन 50 नाटकों में अभिनय व निर्देशन के बाद उन्होंने सिनेमा जगत में कदम रखा।1981 में मराठी नाटक 'हैंड्स अप' में अभिनय के दौरान अमरापुरकर की मुलाक़ात डायरेक्टर गोविन्द निहलानी से हुई। गोविन्द उस समय अपनी फिल्म 'अर्धसत्य'के लिए कलाकारों का चयन कर रहे थे।

अर्धसत्य' और 'सड़क' जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाले सदाशिव अमरापुरकर ने दो बार फिल्मफेयर का खिताब हासिल किया। साल 1984 में फिल्म 'अर्धसत्य' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का खिताब मिला, जबकि 1991 में आई फिल्म 'सड़क' में शानदार अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ खलनायक के खिताब से नवाजा गया। 1990 के दशक में उन्होंने ‘मोहरा’, ‘इश्क’, ‘हम साथ साथ हैं’, ‘आंखें’, ‘कुली नंबर 1’, ‘जय हिंद’ और ‘मास्टर’ जैसी फिल्मों में कई सहायक और हास्य भूमिकाएं निभाईं। बॉलीवुड में उनकी आखिरी फिल्म 2012 में आई 'बॉम्बे टॉकीज' थी, यह फिल्म भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष का जश्न मनाने के लिए बनाई गई थी।

अमरापुरकर ने फिल्म ‘सड़क’ में एक निर्मम किन्नर की एक यादगार भूमिका निभाई थी, जो उनके फ़िल्मी-सफ़र में मील का पत्थर साबित हुई। जिसपर बात करते हुए उन्होंने स्वयं बताया - "ये जो किरदार है, अनोखा है। आधा मर्द है, आधा औरत है। यह कोठे चलाने वाला इंसान है। एक तरफ उसे औरतों जैसा रहन-सहन उसे अच्छा लगता है। कभी-कभी वह कोठे वाली औरतों को बुला कर उनके हाथों से साड़ी पहन कर, तैयार होकर अपनी फोटो खिंचाता है। दूसरी तरफ बात यह भी है कि वह औरतों की तरह दिखता नहीं है, उनके जैसी खूबसूरती और नजाकत उसके पास नहीं है। ऐसे में वह औरतों से नफरत भी करता है। ठीक वैसे जैसे वह मर्दों से नफरत करता है।" ‘अर्धसत्य’ में खलनायक और ‘इश्क’ में एक स्वार्थी पिता की भूमिका को भी उन्होंने सहजता के साथ बड़े पर्दे पर जीवंत कर दिया था।

पर्दे पर अपने नकारात्मक किरदारों के जरिए लोगों में खौफ पैदा करने वाला यह अभिनेता असल जिंदगी में एक बेहद सज्जन किस्म का इंसान रहा, जिसका जुड़ाव विभिन्न सामाजिक गतिविधियों से बना रहा। अपने विलेन और कॉमेडी के किरदार के साथ सदाशिव अमरापुरकर ने सिर्फ सिनेमा के लिए ही नहीं बल्कि समाज के लिए भी काम किया। सदाशिव अमरापुरकर फिलैन्ट्रोफिस्ट, सोशल एक्टिविस्ट तो थे ही , साथ में वह कई सामाजिक संगठनों के साथ भी जुड़े हुए थे। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति , स्नेहालय , लोकशाही प्रबोधन व्यासपीठ, अहमदनगर ऐतिहासिक वास्तु संग्रहालय जैसे संगठनों से वह प्रमुखता से जुड़े हुए थे। ग्रामीण युवकों के विकास के लिए वह निरंतर प्रयास करते रहे।

अपनी खास शैली के लिए पहचाने जाने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी सदाशिव अमरापुरकर ने अपने तीन दशकों से भी लंबे करियर में चाहे खलनायक की भूमिका की हो या कोई हास्य भूमिका, दोनों में ही वे अपने अभिनय के जादू से भारतीय सिनेमा के दर्शकों का दिल जीतने में कामयाब रहे। उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया जिसमें हिंदी, मराठी, बंगाली, उड़िया व तेलुगु भाषा की फिल्में सम्मिलित हैं।

सदाशिव अमरापुरकर को ‘गुणवान और बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न अभिनेता’ बताते हुए अमिताभ बच्चन, महेश भट्ट और अनुपम खेर समेत बॉलीवुड की चर्चित हस्तियों ने उनके निधन पर शोक जाहिर किया है।

पर्दे की दुनिया में अकसर खलनायक दिखने वाले खिलाड़ी असल जिंदगी में किसी नायक से कम नहीं होते और इस बात के एक आदर्श उदाहरण हैं - सदाशिव अमरापुरकर। खलनायकों को नायकों के समकक्ष ला खड़ा करने के लिए अमरापुरकर को हमेशा याद किया जाएगा। एक कलाकार को कला के क्षेत्र मेँ महान योगदान के लिए श्रद्धांजलि !



No comments:

Post a Comment

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...