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| वर्ष 2010 में हिन्दू महाविद्यालय में शशि और मैं |
16 नवम्बर 2012 - 16 नवम्बर 2013
ज़िन्दगी मानो पहियों पर हो , दौड़ती जा रही है। पर कहीं पहुंचती नहीं ! इस ठेलमठेल भागमभाग में कुछ पल रुकना होगा , ठहरना होगा। ये ठहरना विराम नहीं है , बस पुराने पन्नों को पलटने की कोशिश भर है, ये समझने का प्रयास है कि पिछले एक वर्ष में धरती, आकाश, सूरज, तारे, चंद्रमा सब अपने कर्त्तव्यों का पालन उसी प्रकार कर रहे हैं जैसे पहले किया करते थे, फिर हम क्यूँ वैसे नहीं रहे! जो हम आज हैं उस होने के पीछे क्या कारण रहे! नए चेहरे को देखकर उसकी खाल तक उधेड़कर परख लेना चाहते है कि आदमी की शक्ल में शैतान तो नहीं ! विश्वास करना उतना सरल नहीं रहा।
दिन-दिन अपने निकाले हुए निष्कर्ष ही अधूरे और गैरजरूरी लगते हैं, बदले में नए निष्कर्ष निकाले जाते हैं परन्तु उनका भी वही हश्र ! जीवन के आघात में दर्शन काम नहीं आता। मनुष्य की सबसे बड़ी नियति है-मृत्यु। फिर भी हम जीते है। मृत्यु मनुष्य के प्रयत्नों को , उसकी सक्रियता को बाधित नहीं कर सकती। एक वर्ष बीत गया है तुम्हे देखे, जैसे वह समय बीत गया जो हमने साथ बिताया था। जो बीत गया है वह समाप्त नहीं होता, वह यादों में होता है और यही यादें आधार बनती हैं जीवन की।
तुमसे तो खैर कोई शिकायत नहीं कर रही पर एक तुम्हारी अनुपस्थिति में दुनिया की बदसूरती उघड़कर सामने आ गयी है और हर दिन मानो हमें चिढ़ा रही है। जानती हूँ, दुनिया और कुछ नहीं बस हमारे देखने का ढंग है, कहते है न कि आईने की अपनी कोई तस्वीर नहीं होती। पर शायद हमारे देखने का ढंग दुनिया का विकृत चेहरा ही दिखा रहा है। चलो जाने दो, आज तुमसे बहुत सी बातें करने का मन है और शिकायतें भी। अब तुम सपनों में भी नहीं आते, इतने दूर क्यूँ? नाराज़ हो क्या? आज तुम्हारे लिए एक दीपक जलाया है, प्रकाश आशा और विश्वास का कि हम मिलेंगे शायद किसी और दुनिया में.…
जहां हो खुश रहो, मिस यू !

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