कहते हैं
दुनिया ठीक वैसी ही नज़र आती है
जैसे हम होते हैं
ऑटो वाला लंबा रास्ता चुनता है
मीटर भागता है
सहकर्मी अपना काम आपकी मेज पर खिसका जाते हैं
जो जैसे जितना फायदा उठा सकता है
उठाता है
हम देखते हैं
चुप रहते हैं
शायद एक पेड़ को वे बस पेड़ की तरह देखते होंगे
या नहीं जानते होंगे
चिड़िया का एक नाम चहक भी होना चाहिए
पेड़ का हरा
और बचपन का खुशी
किताब का रेगमार
हंसी आयी?
जो दिमाग का जंग साफ करे
वही रेगमार
तो क्या जो दिखाई देती है
वो है मेरे अंदर की दुनिया
या वो जो मैं बनाती हूं अपने मन में
हर रोज़
थोड़ी और सुंदर
पिछले दिन से
वही है बस असली दुनिया
किताब की उपमा 'रेगमार' से! 📙👌
ReplyDeleteअज्ञेय ने अपनी कविता में नायिका की उपमा 'कलगी बाजरे की' से की है। मेरे ख़याल से इस तरह के उपमान तभी गढ़े जा सकते हैं जब आपकी किसी व्यक्ति/वस्तु के प्रति गहरी समझ हो, और यह समझ गहरे अनुभव से ही उपज सकती है।
अब किताबों के साथ आपके अनुभव का तो 'goodreads' भी साक्षी है। 🙂📚
(मैं भी अपने दिमाग पे लगे जंग को साफ़ करता रहता हूँ) 😀