क्या हो अगर एक दिन मैं अपना चेहरा छूने की कोशिश करूँ
और बस हवा हाथ लगे
क्या इतने साल मैंने अपना चेहरा पहचानने की कोशिशों में ही नहीं बिताएं?
हज़ारों-लाखों साल से इस धरती पर मैं जैसे बस एक शरीर लिए फिरती हूँ
जिसका कोई चेहरा नहीं
जिस पर बड़ी आसानी से फिट हो जाता है
तेज़ दौड़ती मोटरों के बीच सड़क पार करने वाला कोई भी सहमा सा चेहरा
मेट्रो में अपने छोटे से पिटारे से कभी न मिल सकने वाली पेन्सिल ढूंढती परेशान कोई लड़की
जिसकी किताब में रेखांकित नहीं हुई वो बात जो छप चुकी है मस्तिष्क में
कम शब्दों में कहूँ अगर
तो कोई भी ऐसा शख्स
जिसने बोई हों दीवारें अपने इर्द-गिर्द
और फिर बहुत रोकर बनायी खिड़कियाँ...
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