Tuesday, 2 April 2019

आत्मा और ख़ंजर

लड़ते रहे हज़ार लड़ाइयाँ हर दिन
मरते रहे हज़ार मौतें भी

हर सुबह होता पुनर्जन्म
हर रात सोते एक आख़िरी बार

बार-बार

कैसे करे उन शब्दों पर भरोसा कोई
जिनकी आत्मा में खंजर हों कई

यूं कहना कि आत्मा मर चुकी है
ऐसी बात नहीं है
आत्मा मरती नहीं
पर पलायन कर जाती होंगी शायद

फिर वहाँ नहीं मिलती
जहां ढूंढते रहे हों हम हर मौत से पहले अपनी

जहाँ मैं हूँ
वहाँ सुरक्षा की सभी सम्भावनाओं से परे हूँ
यूं नहीं होना था
कि मुझे महसूस होता डर
और तुम भी होते

होना था तुम्हें
लेकिन डर..

No comments:

Post a Comment

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...