कि.....
कि कितनी ही बातें हैं
जो होनी हैं हमारे दरमियाँ
कि कितनी ही शामें
गुज़ारनी हैं एक साथ
कि कितनी ही बार लिखनी हैं
ऊँगली से तारीखें रेत पर।
कि तुम सुनना मेरी आवाज़
जब शब्द चुक जाएँ
कि बस आस-पास कहीं
खड़े हो जाना
जब लगूँ हारने।
कि हम बचाएँगे ये दुनिया
प्यार और आँसुओं से
कि रखेंगे दिल के साथ
आँख और कान भी खुले
कि पहचानेंगे
दुःख और अपमान।
कि हम भीगेंगे
झमाझम बारिश में
बर्फ के गोले
भर लाएँगे अपनी जेबों में
हाथ थामकर
ऊँचे-ऊँचें पहाड़ चढ़ेंगे
समंदर की लहरों पर
धसकते रेत पर
उड़ेंगे एक साथ
जो कहना है
वो बस इतना कि
टूटकर करेंगे प्रेम !
कि कितनी ही बातें हैं
जो होनी हैं हमारे दरमियाँ
कि कितनी ही शामें
गुज़ारनी हैं एक साथ
कि कितनी ही बार लिखनी हैं
ऊँगली से तारीखें रेत पर।
कि तुम सुनना मेरी आवाज़
जब शब्द चुक जाएँ
कि बस आस-पास कहीं
खड़े हो जाना
जब लगूँ हारने।
कि हम बचाएँगे ये दुनिया
प्यार और आँसुओं से
कि रखेंगे दिल के साथ
आँख और कान भी खुले
कि पहचानेंगे
दुःख और अपमान।
कि हम भीगेंगे
झमाझम बारिश में
बर्फ के गोले
भर लाएँगे अपनी जेबों में
हाथ थामकर
ऊँचे-ऊँचें पहाड़ चढ़ेंगे
समंदर की लहरों पर
धसकते रेत पर
उड़ेंगे एक साथ
जो कहना है
वो बस इतना कि
टूटकर करेंगे प्रेम !
No comments:
Post a Comment