अपनी ज़िन्दगी के 36 साल 8 महीनें जिस काम को मेरे पापा शिद्दत से करते रहे अब उस कार्यभार से मुक्त होने जा रहे हैं (हालाँकि इसे कभी 'कार्य-भार' समझा नहीं पापा ने) हम बच्चें जितने चाव से स्कूल से लौट कर अपने किस्से मनभर सुनाते थे ठीक वैसे ही पापा भी सुनाते। अपने छात्र जीवन के भी और शिक्षक जीवन के भी। शायद इसीलिए पिता और बच्चों के बीच स्वस्थ संवाद की स्थिति बन सकी हमारे घर में। हम जो शहरों में पैदा हो बस यहीं के जीवन को कुएँ के मेंढक की तरह संसार समझ बैठते हैं , के लिए ऐसे संवाद एक पुल की तरह होते हैं। जहां हम जान पाते हैं खेतों की निराई, बुआई, कटाई और जी-तोड़ मेहनत के बारे में। वह मेहनत जिसे करके हमारे माता-पिता हमें शिक्षा और बेहतर जीवन दे पाएँ। अक्सर माता-पिता यही चाहते हैं कि जो सुविधाएँ जो आराम उन्हें नहीं मिल पाए , वो वे अपने बच्चों को दें लेकिन इस इच्छा के चलते प्रायः वे उन्हें वे चीज़ें भी देना भूल जाते हैं , जो उन्हें मिली थी। जैसे अनुभवों की धरोहर ! अपने बचपन में , बड़े-बूढ़ों से उनके ज़माने के किस्से सुनने वाले माता-पिता सुविधाएं जुटाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि यह धरोहर अगली पीढ़ी को सौंपना भूल जाते हैं।
आज सोच रही हूँ कि जीवन की इस नयी पारी को पापा कैसे खेलेंगे ! कहीं उन्हें खालीपन तो महसूस नहीं होगा ! इस अतिरिक्त समय में उनकी सोच का बिंदु क्या होगा ! शायद अपने बाल-सखा (लोटा) को याद करेंगे , या संस्कृत वाले गुरूजी(शास्त्री जी) को याद करेंगे , या रोज़ बदमाशियां कर माँजी से मार खाना याद करेंगे , या ज़िन्दगी की उस करवट को याद करेंगे जो उन्हें गाँव की छाँव से इस दिल्ली की धूप में ले आई। उन चेहरों को याद करेंगे जो कहीं खो गए , जिन्हे दुनियादारी की आपा-धापी में कभी मन-भर याद भी ना कर सके। शायद फिर गाँव लौट जाने को जी चाहेगा , या शायद हमारे भविष्य में ही अपना भविष्य खोजेंगे।
मेरी तो इच्छा है कि पापा खूब घूमें , मम्मी के साथ ! मेरी माँ जिन्होंने खुद को हमेशा घर-परिवार में खपाया है अब उन्हें जीने का, अपने लिए जीने का वक़्त मिले ! तमाम नारीवादी धारणाओं से इतर यह भी एक सत्य है कि मम्मी के लिए ये तभी संभव हो सकेगा जब पापा ऐसे अवसर बनाएँगे। खैर ! इस बदलाव को पूरी तरह सकारात्मक बनाने के लिए आपको बहुत सारी शुभकामनाएँ पापा ! We all love you !

आम लड़की की खास दास्तान ... :)
ReplyDelete