दुःख, निराशा और टूटकर बिखर जाने का दौर लगभग सबके जीवन में आता ही है, शायद ही कोई हो जो इससे अछूता रह जाए। समय के साथ हम या तो मजबूत होकर उन परेशानियों से निपटना सीख जाते हैं या उनके साथ ही ताल-मेल बिठाने लगते हैं। स्थिति चाहे जो हो, ये दौर लौट-लौटकर आते ही हैं , सकारात्मक पक्ष यह है कि लौटकर आने के लिए जाते भी हैं। हमें खुद ही खुद को जुटाना होता है, खुद ही खुद को बनाना होता है, और खुद ही खुद को बचाना होता है।
खुद को बचाने के इस संघर्ष में बस एक कोशिश यह भी हो कि साथ फँसे लोगों को नज़रंदाज़ ना किया जाए। हर इंसान अपने हिस्से का संघर्ष कर रहा है , कितनी सहायता कर सकते हैं पता नहीं पर कम-से-कम मुश्किलें खड़ी ना करें ! बस किसी तरह खुद में और सामने वाले में यह विश्वास जगा सकें कि थोड़ी-सी हिम्मत ! थोड़ा-सा साहस और दोस्त ! सब ठीक होने ही वाला है।
काश! हर इंसान के गले लगकर उसे बताया जा सकता कि उसकी हर दिन की लड़ाई को भले से ये दुनिया सलामी न दे लेकिन दुनिया को वही है जो बचाये हुए है। उसके भीतर दुनिया की सबसे सुन्दर और पवित्र आत्मा बसती है, उसके आँसू दुनिया की गन्दगी धोते हैं , उसका होना ही इस बदतर होती दुनिया में 'आस' बचाये हुए है। 'उम्मीदों' के पंख लगाकर बस बढ़ते जाना है. . . उम्मीद का कोई विकल्प भी तो नहीं !
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