Wednesday, 12 August 2015

समंदर

जहाँ राख है
कुछ जला था कभी
नाक दबा निकल गए आप
राख में दबी चीखें आपको सुनाई नहीं दी
दो मुस्कुराते-खिलखिलाते चेहरों के बीच
गहरा लगाव था कभी
साथ जीने मरने की कसमें थी
प्यार था
विश्वास भी
और थी कभी न अलग होने की उम्मीद
उम्मीद भी गयी विश्वास भी
कसमें भी टूटी और लगाव भी
एक-दूसरे में खुद को खोजने वाले प्रेमी
खुद को पा गए
मगर
टुकड़ा-टुकड़ा
जिन्होंने टुकड़ों को समेटा
कुछ बन गए
बाकि बस बिखरे ही रहे
समंदर की लहरों के बीच
पानी से खेलते हुए
वे तस्वीरों में लम्हें क़ैद कर रहे थे
लम्हें सारे टूट गए
रह गई तसवीरें !
पानी की बूँदे
जमा हो रही थी
जिन्हें हो जाना था वाष्प
वे बना रही थी काई
पास ही में खाई
जो संभल गए
बचकर निकल गए
जिनका पाँव फिसला
वे धँसने लगे
सबकुछ एक प्रक्रिया है
धँसना भी
यूँ ही अचानक नहीं समाता कोई गर्त में
गीले रेत पर बनाते पाँवो के निशाँ
और रोमांचित होते खिसकते रेत से
मानो कहीं उड़े जा रहे हो
लग गए हो पँख
उड़ते-उड़ते धँसते हैं
धँसते-धँसते उड़ते
पँखों की उड़ान में
ज़मीन छूट गई
जिनकी ज़मीन छूटती है
उनके पाँव बादलों से टकरा सकते हैं
लेकिन सिर धँसता ही जाता है
कहीं गहरे धरती में
सिर के कितना नज़दीक है नाक
और पैरों से कितनी दूर
जब तक पाँव ज़मीन की सतह को छू रहे थे
खतरा नहीं सूँघ पाई
ज्यों ही पाँव बादलो में
सिर ज़मीन में
यह सचेत हो गई
पर बादलों को रौंदते पैर
अब ज़मीन में सिर के धँसने की कहानी कहते हैं
रेत अब नाक को ढक रहा है
बादल बस महसूस हो रहे हैं
रुई के फाए से
हल्के और मुलायम
जिन्हें आहिस्ता से छूकर गुज़रना था
चेहरे को
गालों को
जिन्हें पलभर थामना था हमारी हथेली को
उनका स्पर्श महसूसने से पहले ही
दम घुटने लगा
रेत का कीचड मुँह में भरने लगा
सबकुछ कितना पास था
सपनीले बादल
और कीचड़
अपने पाँवों और सिर की दिशा तय करनी थी बस
लेकिन सभी तो अपने पाँवों से चल रहे हैं धरती पर
अलग क्या!
अलग की ज़रुरत ही क्या !
अलग बस इतना कि
हमनें वह किया
जो करना चाहा
चाहा और किया
तो क्या जो अब हम नहीं
कम से कम हम हम हैं
ऐसा तो नहीं कि
हम हम ही नहीं ।

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