Thursday, 28 May 2015

धूप-छाँव

परतें
अनगिनत
अनंत तक
छीलते जाना हर दिन

वो जो झरोखा है
रौशनी का वादा था उसका
अब डराता है
झाँक ना पाए कोई
जूझना खुद ही खुद से
लड़ना खुद की खामियों से
हाँ! खामियाँ !
बहुत हैं..बेहिसाब

चिल्लाने की विफल कोशिशें
आवाज़ का कहीं भीतर ही घुट जाना
आईने में मुस्कुराता चेहरा
कितना भयावह!
ना रो पाने की तड़प
कुछ ना कर पाने की कसमसाहट

किताबें
बिस्तर
सामने रखी अलमारी
अलमारी में रखा सामान
और सोच
सब बेतरतीब!

पाँव
जिनपर नज़र आते हैं निशान
धूप और छाँव के
इन्हीं पाँवो के नीचे
घंटों तक महसूस करना है
समंदर की लहरों को

बुझती आँखें
कम होती रौशनी
इन्हीं में भरना है अथाह विस्तार

थकता मन
दम तोड़ता साहस
इसी से करनी है तय यह यात्रा

अनथक।

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