मासूम चेहरा, सहज अभिनय, एक ऐसा कलाकार जिसमें हर आम आदमी अपना अक्स देख सकता था, अब हमारे बीच नहीं रहा। २ दिसंबर २०१४ को पुणे में हिंदी सिनेमा में स्वस्थ हास्य अभिनय के लिए मशहूर देवेन वर्मा का निधन हो गया।
इस दुनिया में सबसे मुश्किल काम है किसी को हंसाना. आप भावुक होकर किसी को रुला तो सकते हैं लेकिन खुद मजाक बनकर दूसरे को हंसाने के लिए काबीलियत की जरूरत पड़ती है, जिसकी कमी कम से कम बॉलिवुड में तो नहीं है. बॉलिवुड सितारे भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि उनके कॅरियर की सबसे मुश्किल भूमिका वहीं होती है जिसमें उन्हें दर्शकों को हंसाने का काम सौंपा जाता है। यह काम देवेन वर्मा बख़ूबी करते थे
हिंदी सिनेमा में अपने सहज व जीवंत अभिनय के चटख रंग बिखेरने वाले जमीन से जुड़े अभिनेता देवेन वेर्मा को उनकी अदायगी के लिए सदा स्मरण किया जाएगा। देवेन वर्मा ने अँगूर, खट्टा मीठा, प्रोफेसर की पड़ोसन, नास्तिक, चोर के घर चोर जैसी फिल्मों के जरिए यह साबित कर दिया था कि दर्शकों को हँसाने के लिए भौंडी एवं अश्लील हरकतों की कतई जरूरत नहीं है। देवेन वर्मा की कॉमिक टाइमिंग जबरदस्त थी। चेहरे पर निर्विकार भाव लाकर चुटीली बातें करना उनकी खासियत थी। उन्होंने अपने समकालीन दूसरे कॉमेडियन की तरह फूहड़ता का सहारा नहीं लिया। उनके हास्यी-विनोद और हाव-भाव में शालीनता रहती थी।
देवेन वर्मा ने अभिनय में अपने करियर की शुरुआत एक मंच कलाकार के तौर पर की थी। वर्ष 1961 में आई यश चोपड़ा की फिल्म 'धर्मपुत्र' में सपोर्टिंग ऐक्टर की भूमिका के जरिए उन्होंने बॉलिवुड में कदम रखा। हालांकि यह फिल्म कुछ खास कर नहीं पाई। वर्ष 1975 में आई फिल्म 'चोरी मेरा काम' में देवेन वर्मा के अभिनय ने उन्हें शोहरत दिलाई। इस फिल्म ने उन्हें उनका पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट कमीडियन दिलाया। वर्ष 1982 में आई गुलजार की फिल्म 'अंगूर' में वर्मा ने बहादुर का डबल रोल किया था, जिसे हिंदी सिनेमा की सबसे पसंदीदा हास्य भूमिकाओं में से एक माना जाता है।
देवेन वर्मा ने अँगूर एवं कई अन्य फिल्मों में अपने समय के मशहूर अभिनेता संजीव कुमार के साथ सजीव अभिनय कर दिखा दिया कि वह सहज अभिनय में किसी से कम नहीं हैं। अँगूर शेक्सपीयर की मशहूर कृति 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' पर आधारित एक बेहतरीन फिल्म थी जिसे दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने खूब सराहा।
पारिवारिक फिल्मों के दौर में देवेन वर्मा का एक अलग स्थान रहा क्योंकि उन्होंने कभी भी द्विअर्थी संवादों एवं भौंड़ी हरकतों का सहारा नहीं लिया। हिंदी सिनेमा में जानी वॉकर, सुंदर, मुकरी, महमूद, राजेंद्र नाथ आदि तमाम कॉमडियन के बीच देवेन वर्मा अलग दिखते हैं। अपनी इसी ख़ास छवि के कारण ही वे शेष कलाकारों से अलग नज़र आते थे।
वर्ष 1969 में फिल्म 'यकीन' के साथ ही वह फिल्म निर्माता भी बन गए थे। दो वर्ष बाद उन्होंने 'नादान' के जरिए निर्देशन में हाथ आजमाया। उन्होंने वर्ष 1978 में अमिताभ बच्चन को लेकर फिल्म 'बेशर्म' का निर्माण और निर्देशन किया। सिद्धांतों के पक्के माने जाने वाले वर्मा ने लगातार ऐसी भूमिकाएं करने से इनकार किया, जिनमें विकलांगों या शारीरिक तौर पर कमजोर लोगों का मजाक बनाना चरित्र की मांग थी। अपने सिद्धांतों के दम पर उन्होंने फिल्म उद्योग में सम्मान हासिल किया। 'मेरे यार की शादी है' और 'कलकत्ता मेल' के बाद वे फिल्मों से दूर हो गए थे।
कई दशकों तक उनका अभिनय लोगों के सिर चढ़कर बोलता रहा और उन्होंने अँगूर, नास्तिक, किसी से ना कहना, साहब, युद्ध आदि फिल्मों में शानदार अभिनय किया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी देवेन वर्मा ने चार फिल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया। इनमें नादान, बड़ा कबूतर, बेशर्म और दाना-पानी शामिल हैं। उन्होंने दो फिल्मों आदमी सड़क का और दूसरा आदमी में पार्श्व गायन भी किया।
देवेन वर्मा ने हिन्दी सिनेमा के युग पुरूष अशोक कुमार की पुत्री रूपा गांगुली से विवाह किया। उन्हें 1976 में चोरी मेरा काम के लिए सर्वश्रेष्ठ कॉमेडियन का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। बाद में उन्हें चोर के घर चोर और अँगूर के लिए भी सर्वश्रेष्ठ कॉमेडियन के फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया।
अपने हर किरदार को संजीदगी से निभाने औए जीने वाले देवेन वर्मा अपनी अनेक भूमिकाओं के जरिये आज भी हम सबकी स्मृतियों में मौज़ूद हैं।




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