अपना बचपन एक तरह की विलासिता लगता है। इसे यहाँ पोस्ट करना भी अपने ढंग की विलासिता ही है पर हममें से कई अपनी बौद्धिकता की पोटली हल्की करते-करते यह भूल गए हैं कि जीवन का एक पक्ष यह भी है जिसमें हम अपनी भागीदारी को नज़रंदाज़ करते हुए इस व्यवस्था , राजनीति, गरीबी, अशिक्षा, सरकारी उदासीनता और क्षेत्रीय असंतुलन पर चिट्ठे छापते हैं।
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रास्ते
मैं जहां भी गई भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...
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खालीपन खुद के वज़ूद की तलाश जीवन की सार्थकता की तलाश कहाँ ले जायेगी? एक सुरंग जिसमें है अँधेरा और अंधापन जो संकरी है इतनी संकरी कि...
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मुट्की! टुनटुन कहीं की”, “इतना खाएगी तो टुनटुन हो जायेगी” ,मेरी एक दोस्त की दादी उसे अक्सर यही कहती हुई पायी जाती थी. टुनटुन नाम से मेरा ...
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“मुझे डर लगता है कि किसी दिन माँ और पिताजी मर जाएँगे”, “बड़ी-बड़ी लकड़ियों पर रखकर हम खुद उन्हें जलाएँगे लता...मुझे जलाना हो...

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