Thursday, 18 December 2014

खिलने की ज़िद पर कलियाँ हैं जैसे !


अपना बचपन एक तरह की विलासिता लगता है। इसे यहाँ पोस्ट करना भी अपने ढंग की विलासिता ही है पर हममें से कई अपनी बौद्धिकता की पोटली हल्की करते-करते यह भूल गए हैं कि जीवन का एक पक्ष यह भी है जिसमें हम अपनी भागीदारी को नज़रंदाज़ करते हुए इस व्यवस्था , राजनीति, गरीबी, अशिक्षा, सरकारी उदासीनता और क्षेत्रीय असंतुलन पर चिट्ठे छापते हैं।

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रास्ते

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