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शशि !! कितनी बातें कितनी यादें !! कहाँ से शुरू करूँ ...शुरू से शुरू करूँ तो उसकी वो निश्छल , कोमल, और मासूम आवाज़ कानों में गूंजने लगती है , जब कॉलेज के पहले दिन उसने कक्षा में परिचय देते हुए कहा था-"जब हम शास्त्रीय संगीत सुनते है तब हमें शिव की अनुभूति होती है।" वह आवाज़ ही काफी थी, उसके व्यक्तित्व की सुन्दरता बताने के लिए।
पूरे एक वर्ष तक हमने अपने अन्तर्मुखी स्वभाव के कारण एक-दूसरे से बात नहीं की, परन्तु कक्षा में उसकी सक्रियता , प्राध्यापकों से उसके द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्न उसकी बौद्धिकता का परिचय देते थे और फिर जब प्रथम वर्ष का परिणाम घोषित हुआ तो सभी के बीच चर्चा का एक मात्र विषय था कि हिंदी विषय में ८१.६% अंक अर्जित करना साधारण बात नहीं है। उसने न केवल कॉलेज अपितु यूनिवर्सिटी में भी टॉप किया। द्वितीय वर्ष में हमारी मित्रता की शुरुआत हुई तब मैंने जाना कि बाहरी तौर पर गंभीर और शालीन दिखने वाले शशि में असीम धैर्य , विनम्रता के साथ-साथ ऐसा चुलबुलापन, हँसमुख व्यवहार भी है जो मुर्दे में भी जान फूँक दे।
शशि के लिए ऐसा कहना अतिश्योक्ति न होगा कि वह विलक्षण प्रतिभा का धनी था। महज २१ वर्ष की आयु में उसने ज्याँ पॉल सार्त्र , अल्बैर कामू , सिमोन दी बोअवार , कार्ल मार्क्स , जैसे विख्यात चिंतकों का दर्शन अध्ययन कर लिया था। वह कवितायें लिखता था, उसे चित्रकारी में विशेष रूचि थी। इन सबसे इतर शशि को व्यक्तिगत रूप से न जानने वालों के लिए यह जानना आवश्यक है कि वह जीवन के प्रति पूर्ण सद्भाव रखता था। सामाजिक व पारिवारिक संस्कारों को स्वयं पर आरोपित नहीं करता था वरन स्वयं अपनी नैतिकता की राह बनाता था। वह प्रत्येक दिन को उत्सव की तरह जीता था। वह हर पल हर क्षण में खुशियाँ व मुस्कुराहटें बिखेरने वाली शख्सियत थी। वह व्यक्ति स्वातन्त्र्य में दृढ विश्वास रखता था। अपनी मेहनत के बूते उसने वो सब हासिल किया जिसकी उसे उम्मीद थी , संभव है, बहुत कुछ ऐसा भी रहा हो जिसे वह हासिल ना कर पाया हो।
वह तो वक्त की सीमाओं को पार कर गया पर यहाँ वक्त है कि लगातार हमारे हाथ से फिसलता जा रहा है। कुछ जाना हुआ तो कुछ अनजाना और अनमना भी, पर इस धुंधलके में भी उसकी स्मृतियाँ है कि दिनोंदिन गहरी होती जा रहीं हैं। मेरा जन्मदिन भूल जाने पर फेसबुक के माध्यम से उसका चातुर्यपूर्ण मासूम जवाब ( हाँ , चतुरता और मासूमियत का अद्भुत मेल केवल उसी में संभव था) "जन्मदिन की बहुत सारी बधाइयाँ मयूरी! मेरा तो मानना है (जो आज से पहले भी मानता था) कि जन्मदिन का उत्सव एक दिन नहीं पूरे महीने मनाना चाहिए. एक दिन खुश रहो और अगले दिन से फिर ज़िंदगी उसी ढर्रे पर, कितनी गलत बात है. और एक बात और जिसे तुम भी मानोगी कि किसी अपने को सुखद जीवन की शुभकामनाएँ देने के लिए किसी दिवसविशेष की जरूरत नहीं होती. पर गलती तो हुई ही है. हो सके तो माफ़ करना. माँ मीनाक्षी तुम्हें खुश रखे और हमेशा तुम्हारा साथ दे." तृतीय वर्ष के अंत में मेरे लिए लिखे एक लेख में उसने मेरे सुन्दर भविष्य की कामना करते हुए लिखा था-"हमेशा एक अर्थवान जीवन जीने की कोशिश करना।" तब भी मैं सोचती थी कि उससे पूछूंगी कि ऐसा क्या है जो जीवन को अर्थवान बनाता है? पर अब शायद स्वयं ही इसका अर्थ समझना होगा।
तुम बहुत याद आते हो, शशि ! तुमने थोड़ी जल्दी की , वरना उस पार तो सभी को जाना है। हम भी आयेंगे और तब तुमसे इस धोखे का जवाब मांगेंगे। जानती हूँ हमेशा की तरह, हर सवाल का जवाब होगा तुम्हारे पास। लेकिन तुम्हारे वे सारे जवाब हमारे दुःख के सामने बौने पड़ जायेंगे।
जानते हो ,हम पर तुम्हारा क़र्ज़ है, तुम्हारे भोलेपन, तुम्हारी मानवीयता और तुम्हारे पावन व्यक्तित्व का क़र्ज़। हम पर क़र्ज़ है तुम्हारी संवेदनाओं का, तुम्हारी विवशताओं का, और तुम्हारी छटपटाहटों का। हर पल तुम्हारा मासूम निरीह चेहरा याद आता है, और याद आता है हमारा तुम्हारे लिए कुछ भी न कर पाना। जिस दुःख को तुम साल कर चले गए वही दुःख अब हमें जीवनभर सालता रहेगा। जीवन भर यह बात हमें कोसेगी कि हम तुम्हें काल की कठोर थपेड़ों से बचा न सके। पर अब हमें जागना होगा इस लम्बी नींद से, क्योंकि लम्बी नींद भी मृत्यु का ही लक्षण है। तुमसे बहुत कुछ सीखा और जाते-जाते भी तुम हमें एक पाठ सिखा गए। एक ऐसा पाठ जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। करते भी कैसे? हम तो स्वप्नदर्शी है, हमें कल्पनादर्शी होने की आवश्यकता है (ऐसा भी तुम्ही ने कहा था). यादों की कोई सीमा नहीं है, कैंटीन में बैठकर घंटों होने वाली बातों को, जो हमारे लिए अतिमहत्वपूर्ण हुआ करती थी( जिसमे हॉरर धारावाहिक, खिचड़ी, साराभाई वर्सेस साराभाई से लेकर समाज-राजनीति, साहित्य और दर्शन शामिल थे) एक लेख में कैसे समेटा जा सकता है।

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