बच्चों से कितना कुछ सीखा जा सकता है ना ! खलील जिब्रान ने कहा था कि " बच्चों को प्यार दीजिये अपने विचार नहीं , उनके पास अपने खुद के विचार हैं। आप उनके शरीर में घर कर सकते हैं पर उनकी आत्मा में नहीं क्योंकि उनकी आत्माएँ भविष्य में निवास करती हैं जिसमें आप अपने स्वप्न में भी विचरण नहीं कर सकते।" परन्तु मुझे तो ऐसा महसूस हुआ कि बच्चों से पूरी संज़ीदगी से संवाद कायम रखने , उन्हें वक्त देने से , वे अपने स्वप्नों की दुनिया में बड़ों को सहर्ष ले जाते हैं। आज कक्षा में एक पर्चा एक बच्चे से दूसरे बच्चे, दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे पर चुपके-चुपके पहुंचाया जा रहा था, मामले की तह में जाने पर पता चला कि क्रिसमस से एक माह पहले ही आज सब एक काग़ज़ पर एक-दूसरे का नाम लिख रहे थे। इससे क्या होगा? "इस कागज़ पर जिसका नाम होगा उसकी इच्छा पूरी हो जायेगी" कौन करेगा ये इच्छा पूरी? "सेंटा क्लॉज़" पिछले साल इच्छा पूरी हो गयी थी? "पिछले साल!!!.... हाँ हो गयी थी।" क्या इच्छा थी? "वो तो हमको याद नहीं" उनका यह विश्वास कि कागज़ पर नाम लिख देने से उनकी प्रार्थनाएं क़बूल हो जाएंगी मुझे बहुत मासूम और प्यारा लगा। उनके विश्वास में अपने विश्वास की एक कड़ी मैं भी जोड़ आई और उस कागज़ पर अपना भी नाम लिख दिया।
"इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना।
हम चलें नेक रस्ते पे हमसे, भूल कर भी कोई भूल हो ना।
दूर अज्ञान के हो अंधेरे, तु हमें ज्ञान कि रोशनी दे।
हर बुराई से बचते रहे हम, जितनी भी दे, भली ज़िन्दगी दे।
बैर हो ना किसी का किसी से, भावना मन में बदले की हो ना।
हम चलें नेक रस्ते पे हमसे, भूल कर भी कोई भूल हो ना।
इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना।"
एक प्रार्थना मेरी भी -
हे भगवान ! इन बच्चों को ऐसे ही मासूम और निष्कपट बनाएं रखना !

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