Thursday, 18 December 2014

. . .नाज़ुक से मोती हँस दे फिसल कर

बहुत कुछ है जो गलत घटित हो रहा है हमारे आस-पास। मन खिन्न हो गया है इस प्रकार की मानसिकता से। वे कहते हैं - "ये प्राइवेट स्कूल के बच्चे नहीं है मैडम ! इन्हें एक ही बात चार घंटे समझाओ तब भी डिब्बा गोल रहेगा इनका। ये बच्चे 'रेस्पोंस' नहीं देंगे।"

अभी मेरा अनुभव बहुत कम है-मात्र 10 दिन। पर इन 10 दिनों में मुझे 5वीं कक्षा में पढने वाली यास्मिन मिली, जो रोज प्रार्थना समाप्त होने पर देरी से विद्यालय पहुँचती है और रोज़ डांट खाती है। मेरे कारण पूछने पर आज उसका जवाब था- "मैम , हमारे पापा काम नहीं करते , शराब पीते हैं। मम्मी अस्पताल जाती हैं , वे नर्स हैं। रात को जाती हैं सुबह घर आती हैं । जब तक मम्मी नहीं आती मैं छोटे भाई को संभालती हूँ और खाना बनाती हूँ ।फिर मम्मी जब आ जाती हैं तब स्कूल आती हूँ।"

10 वर्षीय यास्मिन अगर अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के लिए 'रेस्पोंस' कर सकती है तो कक्षा में पढाये जाने पर क्यूँ नहीं ! वास्तविकता तो यह है कि ये लोग यह समझ बैठे हैं कि बच्चों के दो ब्रांड हैं - एक सरकारी स्कूल के बच्चें तो दूसरा प्राइवेट स्कूल के बच्चें । ग़लत सोचते हैं यें, बच्चों के दो ब्रांड तो हैं पर सरकारी-प्राइवेट नहीं वरन् जीवन जीने वाला वर्ग और जीवन जीने का सलीका सीखने वाला वर्ग।

सरकारी स्कूलो की चुनौतियां बेशक टॉपर्स की फ़ेहरिस्त तैयार न करने देती हों, लेकिन जीवन जीने का सही ज्ञान इन स्कूलों में बच्चें आज भी सीलन भरे कमरों में बैठकर ग्रहण करते हैं।

बहरहाल मैं खिन्न हूँ, थोड़ी दुखी भी पर निराश ! निराश बिलकुल नहीं हूँ।

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