मैं जहां भी गई
भागकर खुद से
मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं
कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी
जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल
और जूता पैर काटता हो
कहीं देखना चाहूं तो लगता है
कितनी परतें हैं आंखों पर जमा
उन्हें छू दूं तो बह जाएं रंग इंद्रधनुषी
वो कहां पहुंचते हैं
जिन्हें पता नहीं होता
कि कहां के लिए निकलें हैं
जो नहीं याद रख पाते दिशाएं
घर ढूंढ़ते हैं उम्र भर
ऐसा करते हुए
शायद बहुत से रास्ते उनके साथ हो जाते हैं
लेकिन जो साथ है
उसके बारे में वे सोचते तक नहीं
वे तो क्योंकि भूल आएं हैं अपना घर।
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