आज पूरा शहर घर जल्दी पहुँचना चाहता था
क्योंकि कोई घर पर नहीं रहेगा
एक जनसैलाब सड़कों पर उतरने वाला था
मुझसे कहा गया कि ऐसा "भव्य" दृश्य ज़रूर देखूँ
कैसे मैं सड़कों पर इकट्ठा हुए हुजूम में शामिल हो जाऊँ
कैसे ना सोचूँ कि कैसे कोई बीमार पहुँचेगा अस्पताल तक
आज कोई इस शोर से परेशान कह रहा था
कि दो दिन पहले मुहर्रम थी
पर ऐसा शोर नहीं हुआ
मुझे लगा
लोग भूल चुके हैं क्या
फ़र्क़ करना
उत्सव और मातम में
या शायद सेकुलरिज़्म में छेद इतने हैं
कि हिन्दू-मुसलमान का झंडा उठाये बिना
किसी कुरीति पर वे बोल ही नहीं सकते
मुझे शक हो रहा है
अपने पर
कि कुछ हजम क्यों नहीं होता
न ये न वो
बिस्तर पर रोज़ सुबह ख़ुद को सुलाकर
घर से बाहर निकलती हूँ
भूल आती हूँ ख़ुद को
नहीं भूलती पर छतरी
इस शहर में बरसात कभी भी हो जाती है
इन सब का एक ही इलाज मुझे पता था
मुँह तक चादर ढाँपकर सो जाना
पर उसकी मोहलत ही कहाँ थी!
क्योंकि कोई घर पर नहीं रहेगा
एक जनसैलाब सड़कों पर उतरने वाला था
मुझसे कहा गया कि ऐसा "भव्य" दृश्य ज़रूर देखूँ
कैसे मैं सड़कों पर इकट्ठा हुए हुजूम में शामिल हो जाऊँ
कैसे ना सोचूँ कि कैसे कोई बीमार पहुँचेगा अस्पताल तक
आज कोई इस शोर से परेशान कह रहा था
कि दो दिन पहले मुहर्रम थी
पर ऐसा शोर नहीं हुआ
मुझे लगा
लोग भूल चुके हैं क्या
फ़र्क़ करना
उत्सव और मातम में
या शायद सेकुलरिज़्म में छेद इतने हैं
कि हिन्दू-मुसलमान का झंडा उठाये बिना
किसी कुरीति पर वे बोल ही नहीं सकते
मुझे शक हो रहा है
अपने पर
कि कुछ हजम क्यों नहीं होता
न ये न वो
बिस्तर पर रोज़ सुबह ख़ुद को सुलाकर
घर से बाहर निकलती हूँ
भूल आती हूँ ख़ुद को
नहीं भूलती पर छतरी
इस शहर में बरसात कभी भी हो जाती है
इन सब का एक ही इलाज मुझे पता था
मुँह तक चादर ढाँपकर सो जाना
पर उसकी मोहलत ही कहाँ थी!
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