Thursday, 28 February 2019

माँ, आवाज़ और सन्दूक

मुझे याद है
जब शुरु किया मैंने 
अपना इलाज
तो सबसे पहले
क़ैद में लिया अपने दिल के उन हिस्सों को 
जिन्हें तुमने चुना मेरे ख़िलाफ़ 
और यह भी ग़ौरतलब रहा कि 
तुम्हें कभी ख़ला नहीं मेरे एक हिस्से का यूँ अपाहिज़ हो जाना
मैं अपनी नींद में देखती तुम्हारा जागना  
मैं देखती कैसे रगड़ते जाते तुम माथा अपना
मेरी उँगलियाँ जागती
एक सदी सो चुकने के बाद
पहुँचती तुम्हारे पास तक
मुझे कुछ पुकारता
मैं पहचानती हूँ
अँधेरे की आवाज़ें भी
पर ये मेरी माँ की आवाज़ है
हज़ारों सालों से लोहे के एक बड़े से सन्दूक में बंद
सन्दूक जब-जब खुलता
माँ का जीवन भी खुलता
17 साल की लड़की के सपने
हर साड़ी की एक कहानी
जीवन में खायी तमाम चोटें, धोखें
माँ के किस्से मुझे लगता है मैं तब से सुनती आ रही हूँ
जब जन्म नहीं हुआ था मेरा
या शायद माँ का
मुझे इस क़दर याद हैं सब बातें 
कि जानती हूँ
कब 'हूँ' और हूंकारा देने से उन्हें होगी तसल्ली
कि सुन रही हूँ मैं
सच कहूँ तो कई बार सुनती नहीं हूँ मैं
बस 'हूँ' कहती जाती हूँ
सोचती हूँ हर बार एक ही ढंग से कैसे कही जा सकती हैं इतनी बातें
कितनी बार मन में दोहराई होंगी 
क्यों सन्दूक में बंद हैं इतने दुःख

तुम तक पहुँचने, जागने और सो पाने की लड़ाई में
कितनी बार किसी गड्ढ़े में गिरने से बचाया मुझे एक आवाज़ ने
"सो गई?"
कहीं से ख़ुद को खींचकर लाती हूँ मैं
अपनी भरसक कोशिश से सामान्य आवाज़ में कहती हूँ
"नहीं तो, सुन रही हूँ"

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