उन्हीं में खोजना था सब
जिन्हें लगता था
बुद्धि के अंकुर उन्हीं के आँगन में फूटे थे पहली बार
सबको देखना था
एक सिरे पर ठहरकर
किनारे जब टूटे
तो बह गया बहुत सा वक़्त
हर बार साबित करना था
उनके सामने जो जाने जाते थे
ना आंकने के लिए आदमी की औकात
मुझे बस तुमसे कहना था
कि मत तौलना कभी दुनियावी पैमाने पे
किनारे टूटेंगे
लोग छूटेंगे
लेकिन मन
मन नहीं टूटेगा
जो तुमसे जुड़ा।
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