Thursday, 29 November 2018

"मृणाल"

मेरे घर में 
एक गिलहरी है
अखरोट खाती हुई 
इधर-उधर से आती है
और मेरी हथेली पर बैठ जाती है

जब मैं कहीं दूर जाने का सोचती हूँ
तो लगता है गिलहरी नहीं जा पाएगी वहाँ
अपनी जड़ों से दूर नहीं खिलते फूल

मैं उदास हो जाती हूँ
अपने ना जा पाने या उसके यूँ यहीं रह जाने के कारण नहीं
बल्कि ये सोचकर 
कि सुंदर गिलहरियाँ कैसे कितने रास्तों पर आगे नहीं बढ़ने देती होंगी
कितने ही सपनों को
मोह उनका बाँध लेता होगा

उस छोटी सी लड़की से कैसे कहूँ
कि सम्पूर्णता में प्यार बस उसी ने किया मुझसे
उसके सारे खेल मुझे ज़िन्दा करते हैं हर रोज़ 
जो पाया उससे शब्दों में नहीं बाँध सकती कभी

मैंने पूछा एकदिन नन्ही चिड़िया तुम क्या बनोगी बड़े होकर
उसने कहा बड़े आराम से
मैं "मृणाल" बनूँगी

मुझे लगा कितना मुश्किल है 
बड़े होने तक वही बने रहना जो हम हैं  
बच्चे लेकिन छोटी उड़ान नहीं भरते
पूरा आसमान नापते हैं। 

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