Thursday, 29 November 2018

"मृणाल"

मेरे घर में 
एक गिलहरी है
अखरोट खाती हुई 
इधर-उधर से आती है
और मेरी हथेली पर बैठ जाती है

जब मैं कहीं दूर जाने का सोचती हूँ
तो लगता है गिलहरी नहीं जा पाएगी वहाँ
अपनी जड़ों से दूर नहीं खिलते फूल

मैं उदास हो जाती हूँ
अपने ना जा पाने या उसके यूँ यहीं रह जाने के कारण नहीं
बल्कि ये सोचकर 
कि सुंदर गिलहरियाँ कैसे कितने रास्तों पर आगे नहीं बढ़ने देती होंगी
कितने ही सपनों को
मोह उनका बाँध लेता होगा

उस छोटी सी लड़की से कैसे कहूँ
कि सम्पूर्णता में प्यार बस उसी ने किया मुझसे
उसके सारे खेल मुझे ज़िन्दा करते हैं हर रोज़ 
जो पाया उससे शब्दों में नहीं बाँध सकती कभी

मैंने पूछा एकदिन नन्ही चिड़िया तुम क्या बनोगी बड़े होकर
उसने कहा बड़े आराम से
मैं "मृणाल" बनूँगी

मुझे लगा कितना मुश्किल है 
बड़े होने तक वही बने रहना जो हम हैं  
बच्चे लेकिन छोटी उड़ान नहीं भरते
पूरा आसमान नापते हैं। 

Tuesday, 27 November 2018

चुप्पियाँ

हम बार-बार बात करते 
कि कैसे हमने पहली बार सुना एक मित्र की मृत्यु का समाचार
और पूरी क्रूर संवेदनशीलता से ज़िन्दा किया उस मनहूस दिन को
फिर याद किया 
उसकी पसंद के रंग, खाने और कविता को
और 
नापसंदगियों को भी 

बातों के सन्नाटे में हमने 
झट से लपका अपना एकांत 
और सोचा ऐसा वक़्त 
जब हम खप चुके होंगे
एक लम्बे रीढविहीन जीवन के बाद 

सोचा कि कितना कुछ है जो जैसा है वैसा नहीं होना चाहिए
और अगली सुबह से करेंगे एक नई शुरुआत

वक़्त को गिनना 
जैसे गिनते हैं सोमवार से दिन
कि कब से नहीं आया शुक्रवार

और जीने के लिए पैसे बहुत कम हैं पास
कि कुछ और काम की ज़रुरत है जैसे
चार हाथ
या चालीस घंटे
किताबें पढ़ने के मिलते नोट
या चलने ही से शायद

जो बात जहाँ कहनी होती है 
वहाँ न कहने से
किसी ऐसी जगह कह बैठते हैं हम 
जहाँ 
सबसे ज़्यादा ग़लत ठहरती है 
सबसे सही बात

जो समझ जाते हैं 
फिर भी नहीं कहते

वे चुप रहते हैं
अंत तक।  

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...