Tuesday, 17 April 2018

ग्यारहवीं - A के लड़के/गौरव सोलंकी




         “मुझे डर लगता है कि किसी दिन माँ और पिताजी मर जाएँगे”, “बड़ी-बड़ी लकड़ियों पर रखकर हम खुद उन्हें जलाएँगे लता...मुझे जलाना होगा”, “माँ की आँखें भी जल जाएँगी लता...माँ के बाल..माँ की हथेलियाँ...”, “हम सब ट्रेन में अचानक मिल गए अजनबियों या दो सभ्य साथी कर्मचारियों की तरह ही उम्र भर बात करते हैं. हम कभी शरीर की बात नहीं कर पाते, न ही आत्मा की.” 

शब्द नहीं, केवल जज़्ब कर जाने को होती हैं, ऐसी कहानियाँ. मुझे लगता है कि कविताओं की तरह कहानियों के भी कई-कई अंतरपाठ होते हैं, हर बार अलग गाँठें खुलती हैं. जब क्लास में कविताओं की व्याख्या पढ़ाई जाती थी तो मुझे हमेशा लगता था कि कविताएँ पढ़ाए जाने का विषय नहीं हो सकती, अपनी पूरी प्रक्रिया में ये तो बस यात्राएं हैं- किसे कब कहाँ ले जाएँ. ये कहानियाँ भी दरअसल कविताएँ ही हैं, एक तरह की प्रक्रिया. जिसमें एक सिरे पर “पतंग” है तो दूसरा सिरा हवा में खुला छोड़ दिया गया है. एक कहानी पढ़ने के बाद अगली पढ़ने की उत्सुकता तो होती है पर जल्दबाज़ी नहीं क्योंकि कहानी ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं होती, मन में कहीं आगे बढ़ने लगती है, या पीछे चलने लगती है. ये कहानियाँ महज़ कल्पना या फैंटेसी का लेखन नहीं है, बल्कि इनमें साझी मनुष्यता की चिंताएँ भी मौजूद हैं.

इन कहानियों में जो सबसे ख़ास बात है वह है कि इनमें प्रेम, क्रोध, अपमान, दिखावा, बदला, घृणा और ईर्ष्या जैसी तमाम भावनाओं को जस का तस दिखाया है, जैसे वे मिलती हैं हमारे एकांत में हमसे, बिना कोई नैतिकता का रेकॉर्ड बजाते हुए.  कहानियों के विषय और पात्र थोड़ा असहज कर सकते हैं. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि एक समाज के तौर पर इन सब मुद्दों पर बात करने की हमारी आदत ही नहीं है.  ‘ग्यारहवीं-ए के लड़के’ की एक-एक कहानी बेहद बेहद ज़रूरी है, इन्हें पढ़ा जाना चाहिए. कई- कई बार. इन कहानियों को पढ़ते हुए शायद सभी को अपने-अपने चींटीपुर नज़र आ जाएँ.|


‘पतंग’ का ज़िक्र अलग से करना होगा क्योंकि ये कहानी मुझे लगा कुछ इस तरह गौरव सोलंकी के नाम के साथ जुड़ जाएगी जैसे मात्र 3 कहानियाँ लिखने वाले चंद्रधर शर्मा गुलेरी के साथ ‘उसने कहा था’ जुड़ी है. कहानी का कुछ हिस्सा :
  


                “इतने में माँ मुझे बुलाने के लिए छत पर आ गई. वह कुछ सामान लाने के लिए मुझे नुक्कड़ की दुकान पर भेजना चाहती थी. साथ ही वह कहने लगी कि मुझे पतंग नहीं उड़ानी चाहिए क्योंकि हमारे घर की छत पूरी तरह खुली हुई थी और मैं गिर सकता था. उसी सुबह पढ़ाई न करने पर माँ ने मुझे एक थप्पड़ मारा था और मैं उससे नाराज़ था. मैंने ऐसे दिखाया जैसे मुझे उसकी कोई बात न सुनी हो. मैं पतंग उड़ाने की अपनी कोशिश में लगा रहा. नीचे कुकर की सीटी बजी और आपने सुना होगा कि माँ ने कहा था, छत खुली हुई है. छत ऐसे खुली थी, जैसे आसमान. बस वह असीमित नहीं थी और माँ ऐसे गिरी, जैसे आसमान के किनारे से कोई तारा फिसलकर नीचे गिर जाए. सब्ज़ी में एक भी सीटी ज़्यादा लग जाती थी तो माँ घर में कहीं भी हो, बदहवास सी होकर गैस बन्द करने के लिए दौड़ पड़ती. तभी मेरी पतंग थोड़ी उड़ने लगी और मैं खुशी में बहरा अन्धा हो गया. सुख कभी-कभी हम पर ऐसा ही असर डालता है. माँ ने सँभलने के लिए फ़ुर्ती से हाथ-पैर चलाए होंगे. दस-बारह सेकंड के लिए मुँडेर की एक ईंट को वह पकड़े रही. वह चिल्लाई भी. उसने मेरा नाम पुकारा. वैसे, जैसे उसके सिवा कोई नहीं पुकारता था. मैं ख़ुश था और उससे अपनी नाराज़गी इतनी जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहता था. इसलिए मैं मंत्रमुग्ध सा अपनी पतंग को देखता रहा और मैंने पलटकर नहीं देखा. मैंने नहीं देखा कि वह एक ईंट के सहारे झूल रही है. मुझे लगा कि वह आख़िरी सीढ़ी पर खड़ी होकर गुस्से से मुझे पुकार रही है. सुबह के सवा ग्यारह बजे थे और एक घंटा पहले ही हम सबने एक साथ ‘चन्द्रकांता’ देखा था.

           उन दस-बारह सेकंड में माँ ने क्या-क्या सोच लिया होगा? हम सबका पूरा अतीत और पूरा भविष्य शायद! वह कौनसी दृष्टि थी हे ईश्वर, जिससे उसने मुझे आखिरी बार देखा था? मैं बेफ़िक्र था और अपनी पतंग को देखता हुआ मुस्कुरा रहा था. वही उसके लिए दुनिया का आखिरी सीन होगा और फिर उसने आँखें बन्द कर ली होंगी. एक रुपए की वह ईंट मेरी माँ का बोझ नहीं सह पाई और उसे लेकर चालीस फीट नीचे जा गिरी.

           माँ तारा नहीं बनी कि शाम का खाना जल्दी-जल्दी निपटाकर हम आकाश की ओर मुँह फाड़कर उसे एकटक देख पाएँ. माँ पतंग बन गई और मैंने पहले उसे एक अख़बार में लपेटकर उस मिट्टी में गाड़ दिया, जिसमें वह गिरी थी. लेकिन मुझे उसकी इतनी याद आती थी कि तीसरे ही दिन मुझे वह पतंग निकाल लेनी पड़ी. मैं उसे अपने बस्ते में रखकर स्कूल ले जाना चाहता था. मैं नहाते हुए उसे बाथरूम के आले में रख देना चाहता था, ताकि वह देख सके कि मैं ठीक से रगड़-रगड़कर नहाता हूँ या नहीं. मैं कुहनी या गर्दन का मैल उतारना भूल जाऊँ तो वह मुझे याद दिला सके. आप समझने की कोशिश कीजिए कि एक दस साल का बच्चा, जिसे अब तक उसकी माँ नहलाती रही हो, बहुत कुशलता से अपने आप नहीं नहा सकता”. 

            “उन मुश्किल दिनों में, जब रात में चाँद पतंग के आकार का दिखता था, चाहे दूज हो या अष्टमी या पूर्णिमा, मैंने अपने जीवन की पहली चोरी की. क्लास में एक दिन मेरी आँखों से अचानक टपटप आँसू बहने लगे. मैं डेस्क पर रखे अपने बस्ते पर सिर रखकर बैठ गया, जैसे हम बच्चे अक्सर थककर बैठ जाते थे. गणित वाले सर क्लास में नहीं आए थे और सब बच्चे शोर मचा रहे थे. सर क्लास में आते तो एकदम से शांति हो जाती और तब मेरे सुबकने की आवाज़ सबको सुनने लगती. उनके आने पर सबके साथ मुझे भी खड़ा होना पड़ता और तब तो सबको मेरा आँसुओं से भीगा चेहरा दिख ही जाता. मैं ऐसा नहीं होने दे सकता था. उन कठिन दिनों में भी मेरा एक आत्मसम्मान था, जिसे मैं नहीं गँवा सकता था. मैंने अपने साथ बैठने वाले अर्जुन के बस्ते की जेब से उसका रोएँदार रुमाल निकाला और तेजी से अपना चेहरा पोंछकर उसे अपने बस्ते में रख लिया. मैं कभी भी रो सकता था. मेरी माँ मर चुकी थी और दुनिया में रुमालों की सबसे ज्यादा ज़रूरत मुझे ही थी”.



        “मैं रोना चाहता था” कितना मुश्किल था/है जी भर रो पाना. रोने से भी आत्मसम्मान को चोट पहुँचती है, काश हमारे लड़के रो सकते और आत्मसम्मान भी बचा रहता. गौरव सोलंकी ने जिस उम्र में ये कहानियाँ लिखी थीं, मुझे लगा कि ये तभी लिखी भी जा सकती थीं. इन्हें पढ़ना मेरे लिए बहुत ख़ास रहा, शायद पहली बार पढ़ते हुए दूसरी दुनिया में नहीं, अपने आस-पास की अपनी ही दुनिया में थी. सारे पात्र जैसे कभी गली-मोहल्ले में तो कभी स्कूल-कॉलेज में मेरे आस-पास रहे हैं.


        कहानियाँ पढ़कर मुझे लगा कि हम भीतर से कहीं मरे हुए लोग हैं. जब कोई कहता है “हिंदी वालों” की दुनिया संकुचित है ऐसी है या वैसी है तो मुझे कहीं बुरा लगता था पर ग़लत लगता था. “ग्यारहवीं-ए के लड़के” को अश्लील या फूहड़ कहने वाले अगर हिंदी वालों की दुनिया में हैं तो वाकई ये आश्चर्य और शर्मिंदगी की बात है उन सबके लिए जो खुद को इस दुनिया का हिस्सा मानते हैं. इन कहानियों को पढ़ते हुए मुझे कहीं मंटो का संघर्ष भी याद आता रहा.


        ये दौर ज़्यादा उलझा सा, गड्डमड्ड सा है, उसे गौरव सोलंकी ने शायद बहुत सीधे तौर पर कह भर दिया, सीधे और सच्चे रूप में. ये कहानियाँ चुभती हैं क्योंकि ज़माने भर को कोसने वाला पुल नहीं बनाती बल्कि ख़ुद को ग्लानि से भरती हैं.

“घाघ आदमियों के बीच
पेड़ थे सब लड़के”

2 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति । आपका लेखन कहानीकार की कहानी की दशा और दिशा को संपुष्ट कर देता है । जिस तरह आप संग्रह की समीक्षा की हैं मुझे कहानी संग्रह पढ़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है । जल्द ही कहानी पढ़ता हूँ। आपकी समीक्षा कबीले तारीफ है ।

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    1. बहुत शुक्रिया आपका. ज़रूर पढ़िए, मुझे विश्वास है कि कहानियाँ पढ़कर आपको लगेगा कि मैंने बहुत कम लिखा है. :)

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