Tuesday, 15 August 2017

सीढ़ी

बहुत तेज़ी से आस-पास लोग गुज़र रहे थे
सभी को कहीं पहुँचना था
सभी का ध्यान अपने अँगूठे पर था
उसकी एक छाप के इर्द-गिर्द थी सारी सुबहें

अँगूठा नहीं गिना
जब भी गिनी सेकंड्स
गिनती
एक दो तीन.....दस..पचास..सौ
समय का यूँ बीतना
जेबों का भरते जाना
ये कब हुआ
सोचने को ज़रा देर रुक पाते
कुछ सांस आती

एक सीढ़ी पर कई पायदान चढ़ने पर भी
ऊँचाई में फ़र्क नहीं पड़ता
बस दम उखड़ता जाता.

No comments:

Post a Comment

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...