Monday, 21 August 2017

कुछ बातें समय रहते दर्ज करना बेहद ज़रूरी होता है
एक वक़्त के बाद जब वे अपना अर्थ खो देंगी
तब भी किसी और कालखंड का अमिट सत्य रहेंगी
हम उस वक़्त में नहीं उन शब्दों और उन भावों में लौट सकेंगे शायद
या शायद नहीं
कुछ सवाल बदलेंगे
कुछ जवाब
या शायद नहीं
वक़्त सब तय करेगा
तुम्हारे अपराध
और मेरे गुनाह भी
एक ही सफ़र में जब पीछे भेड़िया हो
और रात एक दौड़ में बदल जाए
फिर दिन में बस घबराहटें
किसी को ना कह पाना
कि तुम जानते नहीं कि मेरी आत्मा छीलने से
तुम्हें हासिल कुछ नहीं होगा
एक दिन बस वो ख़त्म हो जाएगी
शायद नहीं
तुम्हारे लिए
मेरे लिए भी शायद
फिर जो होगा उसे हम पहचानेंगे नहीं
या शायद एक नई पहचान के साथ पहचान सकें
पर पुराना नहीं होगा वह चाहे जो हो
शायद इतने अच्छे लोग
जीने नहीं देंगे
दुनिया को थोडा और बदतर होना था
मेरी दुनिया को
या माँगने की फितरत ना होती अपनी
या अपना कोई छिपा हुआ अर्थ
या स्टूल के नीचे थोड़ी ज़्यादा जगह
और थोडा ज़्यादा अँधेरा
थोड़ी ठण्ड कम होती
थोडा ये होता
और थोडा वो भी
या फिर कुछ ना होता

क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ ना हो?



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