Tuesday, 22 August 2017

क्या सब करना है तय करते
एक लंबा वक्त गुज़ारा
कुछ किताबें
कुछ शहर
कई पहाड़ और समंदर
बहुत से छोटे सुख
और बहुत कम बड़े दुःख

फिर
क्या नहीं करना है तय करना चाहा
वो सब होता गया जो नहीं करना तय था
वहाँ खड़े थे हम
जहाँ सब थूकते मुँह पर
दीवार समझकर

अब पता नया है
घर कोई और।

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