Wednesday, 5 April 2017

बीस रुपये का नोट..

पिछले तीन दिनों से घर से बस स्टैंड बस स्टैंड से मेट्रो और मेट्रो से होते हुए सरकारी दफ्तर तक आपके साथ चक्कर लगा रहा है वो। आपके पर्स की छोटी जेब में वो मैला कुचला फटा नोट 20 रुपये का। खूब कोसा जिसने पकड़ाया और जल्दबाज़ी में आप देख भी नहीं पाये।
जूस वाले को दिया तो बोला क्या साहब दूसरा दीजिये। ‘अरे चल जाएगा भैया’ ‘ सड़ी मोसंबी का जूस आपको चलता क्या?’  ख़ैर एक डरे सहमे दिखने वाले लड़के से लाल बत्ती पर दो पैन खरीदे और नोट आगे बढ़ाया। इससे पहले ट्रैफिक फिर चलता उसने अपने पैन झपट लिए और रास्ते से हट गया। आपने कैंटीन में समोसा खाया, दोस्त से गप्पे मारे, बॉस से फटकार सुनी, सर खुजलाया पर 20 रुपये का नोट दिमाग से नहीं गया। ऐसे ही ज़ाया कैसे हो जाने दें भला। याद हैं न वे तीन दिन? चिंता में डूबे हुए, शाम को काम से छूटते ही जिसको चलाने के लिए खूब मेहनत की थी। खैर अब वो पुरानी बात हो गयी। अब तो रुपयों के आदान-प्रदान में मिलाई-जुदाई तक में मिले भेंट को भी आप अच्छी तरह जाँचना सीख गए हैं।

अब याद करने की कोशिश कीजिये, जून की वो रात जब खूब ढूँढने पर भी ऑटो ना मिलने से आप चिपचिपी गर्मी में पैदल चलने को मजबूर थे। पसीने से भीगी कमीज़ ज़िस्म से चिपकी हुई थी। और काँटो सी चुभन!  ‘ऐं बाबूजी कहाँ जाइयेगा?’  और आप पहले लपककर चढ़े और फिर बोले चावड़ी की तरफ ले लो भैया। रिक्शा में अपनी सारी ताकत झोंकते हुए पैडल मारते हुए वह बोला अबकी बार गर्मी रिकॉर्डतोड़ है भैया, आग बरस रही है आग। आप झुँझलाये से जवाब भी नहीं देते और वो ट्रैफिक, बाइक पर सवार अफ़लातून लड़कों, गर्मी, बारिश सब पर बारी-बारी बोला और आप सोचते रहे  ‘बीस रुपये का नोट’.
 यहाँ से अंदर लेना है क्या बड़े भाई? नहीं नहीं यही उतार दो बस। पोपले मुँह पर बेतहाशा पसीना और धुली हुई हँसी। सच में आग बरस रही है और वह हँस दिया। आपका हाथ पर्स की छोटी जेब में,  चेहरे पर आये संशय को छिपाते हुए आपने नोट दिया और देखे बिना ही अपनी बाजू से माथा पोंछते हुए उसने जेब में रख लिया। वो भरोसा था या जाने क्या। बीस रुपये के नोट से भी गला रेंता जा सकता है,  क़त्ल किया जा सकता है और बिना किसी अखबार में छपे ऐसी घटनाएँ अमूमन रोज़ घट रही हैं. आपके सर से बोझ हटा और आपके पाँव मानो हवा में थे। और एक बेहद हलकी गर्म हवा के झोंके ने माथे पर चमकी पसीने की बूंदों को ठंडक पहुंचाई और मुँह से निकला इस बार तो सच आग बरस रही है।

नोट : बैंकों में दोषपूर्ण नोट बदले जाते हैं और नोट को उसी कीमत पर बदला जाता है . यूँ चूना लगाने की आदत से बाज आएं.  जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए एक छोटा सा कदम !


No comments:

Post a Comment

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...