Tuesday, 11 April 2017

लाल खूँटी

खूँटी पर खाल का लिबास
टंगा था
मैंने बस एक नज़र देखा
और जल्दी से अपनी नज़रें घुमा ली
कुछ देर सोचा
अब किस और देखूँ
जिस ओर भी
या यूँ कहूँ जिस चीज़ को भी
ज़्यादा देखा
उसी ने पलटकर घूरा
सब कुछ को देखते हुए कुछ भी ना देखना
मैंने पिछले कुछ सालों में ही सीखा
मैंने सीखा न देखना
पाँव के गीले तलुवे तक को मैंने नहीं देखा
बस महसूस हुआ
तरलता नहीं रंग
लाल
गाढा
सुर्ख लाल
मेरे पाँव के नीचे रोज़ बहता है लाल रंग
लाल खूँटी का रंग
आँखों में
खून ज़बान पे
कोई है,
जो लौटता नहीं !

शशि !

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