Wednesday, 5 April 2017

चाह

एक रात आँगन के पेड़ ने झुककर
पूछा अब भी यकीन है?
यूँ फुसफुसाना उसका मुझे डरा गया
तुम तो नहीं थे
फिर अब?
मैं उग आया हूँ तुम्हारे सपनों में

उस बच्चे ने जो कुछ कहा था
सब सच था
जिसे मुस्कुराकर टाल गयी थी तुम
बसंत के टूटे पत्तों के ढेर के नीचे गड्ढा है
जो बचा सको

ऐसा नहीं कि तुम जानोगी नहीं
या चाहो तो बचा नहीं सकोगी
बल्कि
तुम चाह ही नहीं सकोगी
तुम्हारी चाहना उस क्षण
नहीं रहेगी
तुम्हारी साँसों को
अपराधों के नीचे घोंट देना ही तो काम है मेरा .

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