Monday, 24 April 2017

इक तुम ही नहीं तन्हा, उल्फत में मेरी रुसवा...

14 वर्षीय साँवली और भरे गालों वाली एक लड़की भानुरेखा, लाइट्स की चकाचौंध के बीच खड़ी है, दृश्य है 5 मिनट्स लंबे चुम्बन को फिल्माने का. एक नाबालिग से ऐसा दृश्य विवादास्पद घटना थी। हिंदी ना समझने वाली एक लड़की जिसे स्कूल में होना था वह मायानगरी में अपने पैर जमा रही थी. वह छोटी लड़की भानुरेखा आज रोल मॉडल के रूप में खूबसूरती की मिसाल और एक दिलकश अभिनेत्री रेखा के रूप में अपनी काबिलियत साबित कर चुकी है आज 10 अक्टूबर को उनके जन्मदिवस पर उसी सांवली लड़की के सफर को हम सलाम करते हैं जिसने मुश्किलों में भी कभी अपनी मुस्कान फीकी नहीं पड़ने दी।



तेलुगु फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम करने वाली रेखा के लिए बतौर लीड हीरोइन फ़िल्मी सफर की शुरुआत हुई फिल्म ‘सावन भादो’ से। ‘सावन भादो’ के साथ घर, खूबसूरत, सिलसिला,खून भरी मांग, जुबैदा, इजाज़त और उमराव जान जैसी शानदार और यादगार फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरने वाली रेखा ने अपनी शुरुआत को याद करते हुए कहां ” बॉम्बे एक जंगल की तरह था, जहां मैं निहत्थी चल रही थी। यह मेरे जीवन का सबसे भयावह दौर था। मैं इस नयी दुनिया के तौर तरीकों से बिलकुल अनजान थी. लोगों ने मेरी कोमलता और भावुकता का अनुचित लाभ उठाया। मैं सोचती थी ‘मैं क्या कर रही हूँ? मुझे स्कूल में होना चाहिए था, आइस-क्रीम खानी थी, दोस्तों के साथ मज़े करने थे अपनी उम्र के बाकी बच्चों की साथ सामान्य जीवन के बदले मैं यूं काम करने के लिए मजबूर क्यों हूँ? ‘ हर रोज़ मैं रोती थी क्योंकि मुझे वो सब खाना पड़ता था जो मैं पसंद नहीं करती थी, ऊट-पटांग सितारों वाले कपडे पहनने पड़ते थे जो बुरी तरह चुभते थे। पोशाक, गहनों से मुझे एलर्जी होती थी। बालों में लगाया जाने वाला स्प्रे कितनी ही बार बाल धो लेने पर भी नहीं निकलता था। मुझे एक स्टूडियो से दुसरे में धकेला जाता था। एक 13 वर्षीय बच्चे के लिए यह दर्दनाक था। ‘
इससे मुझे याद आती है वह चिट्ठी जो अभिनेत्री बबिता ने अपनी एक प्रशंसिका को लिखी थी -‘जब तुम मीठी नींद लेती हो, मैं अपने चेहरे पर जमा मेकअप निकाल रही होती हूँ.’ मायानगरी की चकाचौंध में चमक रहे सितारे इस चमक तक पहुँचने के लिए बहुत से दर्द छिपा जाते हैं जो परदे पर नज़र आते हुए भी परदे में छिपे रह जाते हैं। सिमी ग्रेवाल को दिए इंटरव्यू में सिमी के यह पूछने पर कि क्या पिता के बिना बचपन बिताने का उन्हें अफ़सोस है पर रेखा बड़ी साफगोई से जवाब देती हैं कि जीवन में पिता का कभी कोई अस्तित्व रहा ही नहीं तो फिर कमी कैसी ! साथ ही वे यह भी कहती हैं कि उनके मन में किसी के लिए कोई कड़वाहट नहीं है और ना कभी रही है।
बचपन की भानुरेखा को याद करते हुए रेखा कहती हैं कि भानुरेखा अभिनेत्री नहीं बनना चाहती थी बल्कि घर बसाना चाहती थी। एक प्यार करने वाला जीवन साथी और बच्चे चाहती थी। भानुरेखा से रेखा तक के सफ़र में हमसफ़र को लेकर हमेशा विवादों में रही रेखा की कहानी। विनोद मेहरा, मुकेश अग्रवाल के साथ असफल शादियों के बाद अमिताभ बच्चन के साथ रेखा के सम्बन्ध चर्चा में रहें। रेखा की खूबसूरत आँखें शिकायत नहीं करती। झुकती है और फिर उतनी ही खूबसूरती से उठती हैं। तमाम विवादों के बीच भी रेखा ने कभी अनर्गल बयानबाज़ी नहीं की. अमिताभ और रेखा के संबंधों पर रेखा का रुख उमराव जान के गीत की तरह कुछ यूँ रहा – ‘तुझको रुसवा ना किया खुद भी पशेमान ना हुए’.
बॉलीवुड के फ़लक पर बहुत से सितारे छाये लेकिन नए कलाकारों के आने पर जगह खाली करते चले लेकिन रेखा के साथ ऐसा नहीं हुआ उम्र का बढ़ना एक खूबसूरत प्रक्रिया रही, उम्र बढ़ने के साथ उनकी चमक बढ़ती रही। उनकी जादूगरी के हम सब आज भी क़ायल हैं। सदाबहार रेखा का आँखों से मय पिलाने का हुनर आज तलक फीका नहीं हुआ। ग्लैमर की चकाचौंध इस 70 के दशक की अभिनेत्री को पीछे नहीं धकेल सकी बल्कि नए दौर की अभिनेत्रियों को भी टक्कर देने का माद्दा है रेखा में।
उमराव जान के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित रेखा का आज तक हर कोई दीवाना है। हाल ही में लॉन्च हुई इनकी बायोग्राफ़ी ‘रेखा : द अनटोल्ड स्टोरी’ रेखा के फैंस के लिए उनके जन्मदिन का रिटर्न गिफ्ट ही है।



Tuesday, 11 April 2017

लाल खूँटी

खूँटी पर खाल का लिबास
टंगा था
मैंने बस एक नज़र देखा
और जल्दी से अपनी नज़रें घुमा ली
कुछ देर सोचा
अब किस और देखूँ
जिस ओर भी
या यूँ कहूँ जिस चीज़ को भी
ज़्यादा देखा
उसी ने पलटकर घूरा
सब कुछ को देखते हुए कुछ भी ना देखना
मैंने पिछले कुछ सालों में ही सीखा
मैंने सीखा न देखना
पाँव के गीले तलुवे तक को मैंने नहीं देखा
बस महसूस हुआ
तरलता नहीं रंग
लाल
गाढा
सुर्ख लाल
मेरे पाँव के नीचे रोज़ बहता है लाल रंग
लाल खूँटी का रंग
आँखों में
खून ज़बान पे
कोई है,
जो लौटता नहीं !

शशि !

Wednesday, 5 April 2017

'पिता' क्या तुम तक मेरा गिडगिडाना कभी पहुंचता है?

वो कोई पहली रात नहीं थी
जब मोम गले का शरीर को जला रहा था
एक ख़त था पिता के नाम
जिसमें माँगा गया था
एक लड़की का लौटकर आना
यूँ ज़िंदा पिता से मैं कभी नहीं कह पाउंगी
कि एक लड़का जब अपनी साँसें मेरे चेहरे पर छोड़ता है
मैं उस अधूरेपन से मर जाती हूँ हर बार
'पिता' क्या तुम तक मेरा गिडगिडाना कभी पहुंचता है?

चाह

एक रात आँगन के पेड़ ने झुककर
पूछा अब भी यकीन है?
यूँ फुसफुसाना उसका मुझे डरा गया
तुम तो नहीं थे
फिर अब?
मैं उग आया हूँ तुम्हारे सपनों में

उस बच्चे ने जो कुछ कहा था
सब सच था
जिसे मुस्कुराकर टाल गयी थी तुम
बसंत के टूटे पत्तों के ढेर के नीचे गड्ढा है
जो बचा सको

ऐसा नहीं कि तुम जानोगी नहीं
या चाहो तो बचा नहीं सकोगी
बल्कि
तुम चाह ही नहीं सकोगी
तुम्हारी चाहना उस क्षण
नहीं रहेगी
तुम्हारी साँसों को
अपराधों के नीचे घोंट देना ही तो काम है मेरा .

बीस रुपये का नोट..

पिछले तीन दिनों से घर से बस स्टैंड बस स्टैंड से मेट्रो और मेट्रो से होते हुए सरकारी दफ्तर तक आपके साथ चक्कर लगा रहा है वो। आपके पर्स की छोटी जेब में वो मैला कुचला फटा नोट 20 रुपये का। खूब कोसा जिसने पकड़ाया और जल्दबाज़ी में आप देख भी नहीं पाये।
जूस वाले को दिया तो बोला क्या साहब दूसरा दीजिये। ‘अरे चल जाएगा भैया’ ‘ सड़ी मोसंबी का जूस आपको चलता क्या?’  ख़ैर एक डरे सहमे दिखने वाले लड़के से लाल बत्ती पर दो पैन खरीदे और नोट आगे बढ़ाया। इससे पहले ट्रैफिक फिर चलता उसने अपने पैन झपट लिए और रास्ते से हट गया। आपने कैंटीन में समोसा खाया, दोस्त से गप्पे मारे, बॉस से फटकार सुनी, सर खुजलाया पर 20 रुपये का नोट दिमाग से नहीं गया। ऐसे ही ज़ाया कैसे हो जाने दें भला। याद हैं न वे तीन दिन? चिंता में डूबे हुए, शाम को काम से छूटते ही जिसको चलाने के लिए खूब मेहनत की थी। खैर अब वो पुरानी बात हो गयी। अब तो रुपयों के आदान-प्रदान में मिलाई-जुदाई तक में मिले भेंट को भी आप अच्छी तरह जाँचना सीख गए हैं।

अब याद करने की कोशिश कीजिये, जून की वो रात जब खूब ढूँढने पर भी ऑटो ना मिलने से आप चिपचिपी गर्मी में पैदल चलने को मजबूर थे। पसीने से भीगी कमीज़ ज़िस्म से चिपकी हुई थी। और काँटो सी चुभन!  ‘ऐं बाबूजी कहाँ जाइयेगा?’  और आप पहले लपककर चढ़े और फिर बोले चावड़ी की तरफ ले लो भैया। रिक्शा में अपनी सारी ताकत झोंकते हुए पैडल मारते हुए वह बोला अबकी बार गर्मी रिकॉर्डतोड़ है भैया, आग बरस रही है आग। आप झुँझलाये से जवाब भी नहीं देते और वो ट्रैफिक, बाइक पर सवार अफ़लातून लड़कों, गर्मी, बारिश सब पर बारी-बारी बोला और आप सोचते रहे  ‘बीस रुपये का नोट’.
 यहाँ से अंदर लेना है क्या बड़े भाई? नहीं नहीं यही उतार दो बस। पोपले मुँह पर बेतहाशा पसीना और धुली हुई हँसी। सच में आग बरस रही है और वह हँस दिया। आपका हाथ पर्स की छोटी जेब में,  चेहरे पर आये संशय को छिपाते हुए आपने नोट दिया और देखे बिना ही अपनी बाजू से माथा पोंछते हुए उसने जेब में रख लिया। वो भरोसा था या जाने क्या। बीस रुपये के नोट से भी गला रेंता जा सकता है,  क़त्ल किया जा सकता है और बिना किसी अखबार में छपे ऐसी घटनाएँ अमूमन रोज़ घट रही हैं. आपके सर से बोझ हटा और आपके पाँव मानो हवा में थे। और एक बेहद हलकी गर्म हवा के झोंके ने माथे पर चमकी पसीने की बूंदों को ठंडक पहुंचाई और मुँह से निकला इस बार तो सच आग बरस रही है।

नोट : बैंकों में दोषपूर्ण नोट बदले जाते हैं और नोट को उसी कीमत पर बदला जाता है . यूँ चूना लगाने की आदत से बाज आएं.  जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए एक छोटा सा कदम !


Monday, 3 April 2017

सूरजमुखी, खरगोश और अँगारें

मुझे बताना था
कि जहां से देख रहे हो,
देख नहीं पाओगे
अँधेरा मेरा
तुम्हारे और मेरे अँधेरे के बीच
एक लकीर
रौशनी की नहीं
फ़र्क की है
कि मैं घुल सकूँ तुम्हारे अंधेरों में
कि रौशनी नहीं तो ना सही
अन्धेरा छुए तुम्हारा गाल
इतने प्यार से
कि खिल उठे मन तुम्हारा
वो स्पर्श हो जाऊं

क्यारी में सजा जो
कभी कोई फूल
मचलकर तोड़ा हो
तो वो फूल मुझे कभी जगह ना दे

कि सूरजमुखी का फूल जो देखा नहीं कभी मैंने
मुझे जगह देगा
कि अपनी आत्मा से भी ज्यादा
कोई चाह सकता है किसी को
ये मैंने जाना
जब तुम्हें चाहा.

2. खरगोश

जन्मदिन
मुझे याद नहीं जन्मदिन का कोई उत्साह 
या बचपन की इससे जुडी कोई याद
एक चलचित्र है 
जब मैं चार साल की थी
और मेरे जन्मदिन पर धूम मची थी
मैं तब भी अनभिज्ञ थी 
कि वह मेरा दिन था

एक ऐसा दिन जिसे मैंने नहीं चुना
उसपर उत्सव जैसा कभी कुछ मुझे महसूस भी नहीं हुआ 
कोई फ़ोन करता बधाई देता मैं झेंप जाती

तुमसे शुरू हुई सब तारीखें
तारीखें जिन्हें तुम्हें चुनकर
मैंने खुद चुना
26 मार्च
प्यार की तारीख
एक खोज है 
जो इसी रास्ते से होकर गुज़रती है
इस रास्ते पर दिल बस दुआओं से भरा होता है
कि मुलायम खाल के नीचे चिहुंकता दिल
कोई शिकारी ना देख ले

बेशक तुम सारी दौडें हार जाना कछुओं से 
पर नहीं बनोगे कभी हार का उदाहरण 
मासूमियत और चपलता ही तुम्हारे गुण होंगे
ये दौडें तुम्हारे लिए नहीं 
बस मेरे पास चले आना

और आज
23 अप्रैल 
प्यार के जन्म की तारीख
तो खरगोश कब जन्में थे तुम?
क्या हमेशा से यहीं थे? 

3. अँगारे

सखा
जब तुम आओगे मेरे द्वार
तब देखना
यहाँ लोहे की जंजीरें नहीं हैं
बस दहकते अँगारें हैं
छोटे से दायरे में नहीं पैदा होने दिया कोई डर 
जुराबों की बदबू से नथुने ना फटें
और टीवी पर होती बहसें नसों से ना करें खिलवाड़
एक छोटा बच्चा जेब में छुरा लेकर ना घूमें
पैर में पाजेब पहने दो रुपए माँगती 6 साल की लड़की
या शायद 8 की
को देखकर बलात्कार का डर 
कोई डर पार नहीं होता अंगारों की दहलीज से
पर दिल पर नहीं इनकी हुकूमत
ये जलता भी है
दहकता भी है और
और
और डरता भी है।

डर के बहुत से रूपों में से 
सबसे खतरनाक है
अनिच्छा

प्यार ना करना
कभी अनिच्छा से

सखा
आत्मा को यूँ चूमना कि बरस जाएँ सृष्टि
अँगारें ना बुझे
डर मरे कभी ना
सबकुछ जिये 
हमेशा।

प्यारे 
तुम जिओ 
मेरे डर जिये
मेरी दुआओं में तुम यूँ हो कि 
आँख झपकूँ जो तो तुम्हारी तस्वीर 
बंद और खुली आँखों में

तुम्हारी भीगी सी डूबी सी आंखें
मेरे सीने पे पत्थर सी गड़ जाती हैं
तुम जिओ मेरे लाल
ये बात मैं कुछ यूं कहना चाहती हूँ कि
छोटे से घोंसलें में समेटकर तुम्हें
तुम्हारे घुँघराले बालों में फिराऊँ उंगलियां
और अपनी गोद के रास्ते तुम्हें गर्भ में भर लूँ

यह कहना कैसी सी शर्म पैदा करता है 
मन दुआओं और प्यार से भरा है
बाबू मेरा
असंख्य लोग, तारें, फूल, कण-कण, क्षण-क्षण 
तुझे दुलारे
ठंडे पड़ जाएं तेरे लिए
सारे अँगारें।








‘अति सूधो सनेह को मारग है’

‘कभी धरती के तो कभी चाँद नगर के हम हैं’ वह कविताएँ लिखता है, प्रेम बुनता है, उसके शब्दों में छिपा अपना ज़िक्र पहचानकर मुस्कुराती भी हूँ| लेकिन मैं इंतज़ार नहीं करती कि अपनी कविताओं में वो मुझे नदी, बहार, बादल या कोई और उपमा दे, मैं बस सोचती हूँ हँसते हुए कितनी मासूमियत से उसकी आँखें मूँद जाती हैं| किसी रीतिकालीन नायिका की तरह मेरी आँखों को झील सी गहरी कहे ऐसी भी कोई उम्मीद मैं नहीं रखती|
मुझे पसंद आता है यूँ ही बीच बात में अचानक उसे कॉम्प्लीमेंट दे देना| रीतिकाल से वर्तमान तक प्रेमिकाओं का रूप वर्णन और प्रेम के कसीदे पढ़े गए हैं, किसी प्रेमिका की नज़र से एक पुरुष(प्रेमी) के रूप सौन्दर्य का वर्णन न के बराबर ही रहा है| मैं कोई स्यूडो फेमिनिस्ट नहीं कि इसे स्त्री उपभोग की वस्तु नहीं कहकर सारे प्रेम पर आधारित साहित्य को हवा में उड़ा दूँ , सच पूछो तो मैं प्रेम को घनानंद की एक काव्य-पंक्ति में परिभाषित मानती हूँ-
‘अति सूधो सनेह को मारग है’
फिर भी सवाल तो उठता ही है ज़हन में कि क्या प्रेम सिर्फ पुरुषों ने किया? या सृष्टि के निर्माण के साथ सारा सौन्दर्य स्त्रियों के हिस्से आया और सारा सौन्दर्य-बोध पुरुषों के| मुझे फूल बहुत पसंद हैं, लेकिन दुकानों में सजे फूल मेरा ध्यान कभी नहीं खींचते| मुझे लगता है फूलों को उनका स्वाभाविक जीवन मिलना चाहिए, उनका वास्तविक सौन्दर्य भी वही है| ठीक वैसे ही मेरा उसके प्रति प्रेम सजावट की वस्तु नहीं, क्यारी में खिला जीवंत फूल है| मैं अनगिनत प्रेम-पत्र लिखना चाहती हूँ, क्योंकि लडकी होकर प्यार करना छिछोरी बात रही है और उसका इज़हार बेहयाई|
प्यार को लेकर समाज से हमारी लड़ाई दोतरफा नहीं चौतरफा है| सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने के लिए संघर्षरत होना अपेक्षाकृत सरल है बनिस्पत इसके कि एक लड़ाई जो निरंतर खुद से लड़ी जानी है. जो डर हमारे भीतर कूट-कूटकर भर दिए जाते हैं, उनसे लड़ना ज़रूरी होता है| दो अलग शहरों में दो जोड़ी नन्हे पैर अपनी पसंद के रंग का आकाश तलाश रहे हैं| मेरी उँगलियों पर जो तेरह शहर उसने गिने हैं, उन्हें बस नक़्शे पर ही नहीं अपनी आँखों से देखना चाहती हूँ| ऊँचे-ऊँचे पहाड़ चढ़ना चाहती हूँ, समंदर की लहरों को घंटों यूँ ही चुपचाप सुनते हुए अपने तलवों तले देर तक महसूस करना चाहती हूँ. बहुत सारी गलतियाँ करना चाहती हूँ, आधी रात किसी चौराहे पर बैठ अन्ताक्षरी खेलना चाहती हूँ, इन सबसे इतर मैं प्यार करना चाहती हूँ| मैं प्यार में दुनिया की सबसे खूबसूरत कविता लिखना चाहती हूँ|
मैं कुछ और नहीं प्यार लिखना चाहती हूँ.

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...