Sunday, 16 October 2016

फ़रेब हैं आँखें

तस्वीरें कभी ना बदलें
जब वक़्त बदले दीवारें
चले जाने के बहुत करीब आकर ठहर जाना

जब भी बहे वक़्त 
टूटकर ना गिरे कांच

फ़रेब हैं आँखें
ज़हर हँसी
भँवर एक उँगली
वो उंगली तुम

ज़बान पलटकर हलक में
थूकती खून रोज़
बाहर आते शब्द झूठे
वो झूठ मैं
प्यार कहने से पहले रूकती हुई साँस।

Friday, 14 October 2016

फटा पोस्टर और निकला हीरो



सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे

चन्दा की किरण से धुलकर, घनघोर अन्धेरा भागे

कहीं धूप खिले कहीं छाँव मिले लंबी सी डगर ना खले।

किशोर कुमार ! भागलपुर में जन्मा यह सितारा फलाना तारीख को फलाना जिले में जन्मा। और इत्तेफाक देखिये फलाना तारीख को ही इनका निधन हो गया। जाने दीजिये क्या फर्क पड़ता है। फर्क पड़ता है इस बात से कि एक जीवन में जितने जीवन किशोर कुमार जी कर गए वो कितना बड़ा और ख़ास सफर था। प्लेबैक सिंगर के तौर पर किशोर कुमार की शुरूआती कोशिशें ही रंग लायी और उनके गीत कामयाब  भी रहे। के. एल. सहगल और खेमचंद प्रकाश को आदर्श मानने वाले किशोर को सफलता कुछ यूं मिली कि एक दिन वे उससे खीज उठे। लोग उन्हें नसीहते देते कि यूं गाओ और यूं ना  गाओ। कोई उन्हें गंभीरता और सलीके सिखाता तो कोई कहता गाने में मसाला डालो, बूम चिक टाइप यॉडलिंग के लिए कहते। कोई कहता सिंगिंग छोडो और एक्टिंग करो क्योंकि पैसा और कामयाबी इसी में है। गौरतलब है कि किशोर  इन सब नसीहतों पर अमल भी करते। किशोर की मानें तो इसी सब के चलते एक आदर्शवादी लड़का एक मगरूर और दूसरों में दोष ढूंढने वाला नौजवान बन गया। एक वक़्त ऐसा भी आया जब किशोर कुमार अपने गुरु खेमचंद  प्रकाश पर भी हँस दिए. अपनी कॉमेडी को भी वे चार्ली चैप्लिन की नक़ल मानते हैं। किशोर को लगता कि जनता को कॉमेडी के नाम पर उछलता-कूदता बन्दर चाहिए और वे बन्दर  बन जाते। आलोचनाओं को भी नज़रन्दाज़ कर देते। चलती का नाम गाडी से  जुड़े एक किस्से का   ज़िक्र किशोर कुमार करते हैं कि जब एस डी बर्मन उन्हें कुछ धुन सुनाने आये तो उन्होंने उन्हें हड़का दिया कि जनता रॉक एन्ड रॉल सुनना चाहती है, सो किसी म्युज़िक स्टोर से रॉक एन्ड रॉल के रिकॉर्ड्स खरीदिए। यहां तक कि उनकी फिल्म के लिए किसी और गायक की आवाज़ में गाना रिकॉर्ड करने के प्रस्ताव भी उन्हें नागवार गुज़रे।

          फिर एक वक़्त आता है कि दौड़ते-भागते आदमी रुकता है, संभालता है। खुद को टटोलता है और अपनी शिनाख़्त करता है। किशोर को लगने लगा कि वे एक बेमतलब के मसखरे हैं, जिसे बस मसखरी के लायक ही समझा जाता है। अपनी मानसिक बेचैनी को किशोर पागलपन समझने लगे। अपनी बनायी हुई फिल्में उन्हें बेवकूफ़ी लगती। और फिर फटा पोस्टर और निकला हीरो। एक नए किशोर से किशोर की मुलाक़ात होती है- किशोर का एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा है एक फिल्मकार किशोर को अपनी फ़िल्म की कहानी सुनाता है और दृश्य कुछ यूँ समझाता है - आप हीरोइन के बैडरूम में घुसते है वो भी साडी पहनकर...हा हा हा... आप जानते हैं न फिर क्या करना है? किशोर उसे टोकते हैं और कहते हैं कि मैं आपको बताता हूँ कि मुझे क्या करना है यह कहते ही उन्होंने छलाँगें लगानी शुरू कर दी और कलाबाजियाँ करने लगे। फिल्मकार का सर चकरा गया और वह किशोर को पागल समझ उलटे पाँव हो लिया। चुलबुले और यूडलाई यूडलाई युहू वाले अपने किशोर होते होते किशोर कुमार हुए।

         "बेकार की चीज़ों के पीछे भागने की इस अंधी और गलत दौड़ को छोड़ने का वक़्त आ गया है। मैं अब सीधा चलना चाहता हूँ। अगर कॉमेडी है तो वह गूढ़ होनी चाहिए। संगीत हिन्दुस्तानी होना चाहिए। फिल्मों का कोई मतलब होना चाहिए"

        और इस तरह किशोर खुद को पा गए और हम The Kishore Kumar को !

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...