Sunday, 4 September 2016

एक शाम के इंतज़ार में

आसमान से जैसे दिखाई देती है धरती
वैसे ही दिखते हो तुम
मेरे घर
मैं अगर न लौट सकूँ
तो तुम हाथ बढ़ा देना
हाथ थाम लूँ ज़रूरी तो नहीं
पर तसल्ली रहेगी

आगे सारा फैलाव
कदम कदम
जितना था आगे सब पार किया
जो ख़त्म किया
अब पीछे है

अकेला होना उतना बुरा नहीं

एक शाम के इंतज़ार में
चौराहें सारे देखेंगे !





2 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...