Thursday, 15 September 2016

हम फूल खिलाने निकले थे !

हम लगातार भाग रहे थे
अँधेरों से दूर
अँधेरा कालापन छोड़ते हुए चिपक गया था हमारी चमड़ी पर
दो अलग शहरों में रहते हुए हम चार शहरों में जी रहे थे
हिस्सों में आधे-अधूरे
हम भूख दबाते थे
किताबों में नए नए बुकमार्क सजाते थे
उस दिन भी वही बच्ची खिड़की पर खड़ी थी
जिसकी तस्वीर तुमने भेजी थी
यहां उसका नाम बदल गया था
हर शहर एक नया नाम देता है इन बच्चियों को
और शहर बदलने के साथ
मैं बहुत ज़ोर डालने पर भी
वो पुराना नाम याद नहीं कर पाती
उसके एक हाथ में गर्म रोटियों का भरा डब्बा
सिर पर भाप उड़ाते चावल
 एक पतली सी लट
आँखों में चुभ रही है
सुनो बच्ची
कुछ कर पाने से पहले ही सब धूल हो गया
सब धूल होता जाएगा


हम फूल खिलाने निकले थे !

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