जिस मोड़ से
आगे बढ़ गयी थी माँ
वहाँ से मैं कुछ और माँ जैसी हो गयी थी
माँ की साडी में लिपटकर
सारे रंग बिखर गए थे मेरी देह पर
माँ सा हो पाना बस एक ख़्वाब है
घर लौट लौट आना होगा
वो घर को सहेजे रखेगी
कि शाम तक सारे पंछी
किस्सों की दुनिया से आएँगे
और वो सुनकर बस मुस्कुरा देगी
आसमान का आखिरी टुकड़ा वो बचाकर रखेगी
मेरी हर उड़ान के लिए
मेरा सारा स्नेह बस इस कविता तक सिमटकर रह जाएगा
उस मोड़ पर आँसू अब भी होगा क्या
उन कमरों में छूट गया सामान अब कहाँ होगा
सोते हुए कितनी निरीह लगती है माँ
सूखे अधखुले होंठ
जिन्हें चूमने से खरगोश के जैसे चौंक जायेगी माँ
कितनी बड़ी तसल्ली है कि
सब तरफ से ठुकराये जाने पर
गले से लगा लेगी माँ
मेरी चंदा कहकर
छिपा लेगी ।
आगे बढ़ गयी थी माँ
वहाँ से मैं कुछ और माँ जैसी हो गयी थी
माँ की साडी में लिपटकर
सारे रंग बिखर गए थे मेरी देह पर
माँ सा हो पाना बस एक ख़्वाब है
घर लौट लौट आना होगा
वो घर को सहेजे रखेगी
कि शाम तक सारे पंछी
किस्सों की दुनिया से आएँगे
और वो सुनकर बस मुस्कुरा देगी
आसमान का आखिरी टुकड़ा वो बचाकर रखेगी
मेरी हर उड़ान के लिए
मेरा सारा स्नेह बस इस कविता तक सिमटकर रह जाएगा
उस मोड़ पर आँसू अब भी होगा क्या
उन कमरों में छूट गया सामान अब कहाँ होगा
सोते हुए कितनी निरीह लगती है माँ
सूखे अधखुले होंठ
जिन्हें चूमने से खरगोश के जैसे चौंक जायेगी माँ
कितनी बड़ी तसल्ली है कि
सब तरफ से ठुकराये जाने पर
गले से लगा लेगी माँ
मेरी चंदा कहकर
छिपा लेगी ।
Very beautiful written...Really no one can take mother's place!
ReplyDeleteThank you! :)
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