Friday, 5 June 2015

..ग़र कहना है 'प्रेम'

ग़र कहना है 'प्रेम'
तो धीमे से कहो
ज़ोर लगाने पर
अक़्सर लग जाता है
आघात!
शब्दों को खो जाने दो
कहीं भीतर ही
शायद बचा रह जाए उनका
 महत्त्व!
मत खींचों
उधडन पर लगा
सेफ्टी पिन
वो थामे हुए है
एक ज्वार !
फटे हुए को फाड़ने का आनंद
छोटे छेद को करना बड़ा
सुई-धागे का जैसे
काम ही न हो
उधडन पर सिवन
अब बीते ज़माने की बात है
उत्तर आधुनिकता के इस दौर में
सांत्वना और हमदर्दी गाली हैं
प्यार छलावा
जानते हुए भी यह सच
हम निरंतर छलते रहते हैं खुद को!

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