Tuesday, 11 June 2013

अतीत का मकबरा

वो  दिन भी आएगा
जब फटेगा
अतीत का मकबरा
और
उसमें दफ़न 
यादें
अपनी सारी सामर्थ्य
से चीख उठेंगी
पूछेंगी सवाल
आखिर क्यों
उन्हें इतनी बेरहमी से
भुला देने की
साज़िश रची गई !

1 comment:

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...