मैंने ख़ुद से इतनी बातें की
कि बाहर कुछ भी कहने के लिए मैं बहुत थक चुकी थी
मुझे लगने लगा कि
पागलपन सवार हो रहा है मुझपर
ये सब बातें अब मैं बड़बड़ाने ना लगूं कहीं
दिसंबर का महीना था
दिल पर एक बोझ भी
सुबह हुई
मुझसे नहीं उठा गया लेकिन
ऐसी बीमार सुबहों में मुझे मेरे ज़िंदा होने पर ताज़्जुब होता रहा है
दो दिन मैं घर में यूं पड़ी थी
कि अब उठ नहीं सकूंगी कभी भी
मैंने पहले ही कहा
कह पाने के लिए बहुत थक चुकी थी मैं
मैं खुद में बहुत घुटी
गिनने चाहे अपने सारे पाप
शशि मर गया
प्रत्यूषा बैनर्जी मर गई
कुशल पंजाबी मर गया
कितने लोग हर रोज़ मर जाते हैं
कहते तो हैं सब
कि कह देना चाहिए था उन्हें
परिवार से
कुछ अपनों से
कि क्या है जो रात - दिन खाए जाता है उन्हें
पर क्या मर नहीं गए थे अपने सब
उनके लिए
उनके या अपने जेहन में
किसी एक
दिसंबर में ।
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