आँखें कभी मत उठाकर देखना
जब ज़रुरत के वक़्त कोई आए पास
हाथ बढाते हुए कभी मत कहना
मैं समझता हूँ
ढह जाएगा एक पूरा क़िला
इसके दोनों अर्थों से वाक़िफ़ हूँ मैं भी
क्या किया किसने किसके साथ
इसका हिसाब भी कभी मत रखना
होंठों को गोलकर फूँक मारना एक
जलती हुई आँखें बुझेंगी
पिघलते हुए दिलों का बचा रह जाएगा कोई आकार