मेरे पड़ोस में एक औरत
जब भी मेरी तीन साल की भतीजी को देखती है
तो उसे छेड़ने के लिए उसकी चीजों
मसलन उसके कपड़े, टोपी या कोई गुड़िया
देखते ही कहती है
"ये मेरा है, इसे मैं अपने घर ले जाऊँगी"
मेरी भतीजी चिढ़ जाती है
कभी कभी रोती भी है
फिर वह महिला हँसती है
मैं सोचती हूँ ये भी कैसा खेल है
जिसमें एक बच्चे को रुलाकर सुख प्राप्त हो रहा है
ऐसे कई भले लोग होते हैं
जो रुलाकर हँसते हैं, उन्हें 'प्यार' आता है ऐसे
प्यार करना भी सीखना पड़ता है
लगातार सीखते रहना होता है
एक भले दिन रोई नहीं बच्ची
हाथ से गुड़िया फेंक दी
"तेरी है तो तू ही रख"
जीवन में भी शायद यूँ ही होता है
रोना छोड़ देते हैं लोग।