Monday, 27 November 2017

आकाश में तारों से बनाते एक चेहरा
दो आँखों वाला
देखकर मुस्कुराता वो हमें
अपने बनाए चेहरे को तोड़ना चाहते रहे हम उम्र भर
बग़ैर जाने कि उसका टूटना
बिखराव है

एक एक कर सब तारें टूट रहे हैं
चिंगारियों से आँखों की रोशनी कुछ हल्की हुई जा रही है
कि देखो आ जाओ
तुम आए और मैं न देख सकी
तो उसे मेरा ना देखना समझा जाएगा

चेहरा मुस्कुराता नहीं
मुस्कुराने की कोशिश में कुछ अटपटा विकृत सा हो जाता है
और हाथ बढ़ा आकाश से
मेरा गला जकड़ लेता है

ये हाथ किस चेहरे से हैं?
क्या तुम्हारे?
नहीं न?

हमारी नज़रों ने जिसे रूप आकार दिया
वह हमारे प्रति इतना क्रूर कब हुआ?
क्यारी ग़लत चुनी या बीज?
या सींच नहीं पाए ईमानदारी से?

कुछ कहो
ये तारें बोलते नहीं।

Saturday, 25 November 2017

बच्चें अपराधी नहीं होते
जो होता है
वह दरअसल कुछ नहीं
उनका परिवेश है
जिसे हम ही ने रचा

विद्या की कसमें सच्ची थी
क़िताब में रखा पँख भी
सवाल थे बहुत
आँखें आकाश में

इतना हौव्वा सहमा देगा
बचपन को
मत चौंकिए
जिस भी ईश्वर को मानते हो
उसके लिए ही सही
पर इतना मत चौंकिए

चार साल का बच्चा
तमाम बहसों के बाद भी
एक बच्चा ही रहेगा।



Tuesday, 14 November 2017

चलो अब मुस्कुराओ

सबको बताओ कि क्या चाहिए
उनसे या खुद से
ज़रा मुस्कुरा के

थोड़ा गुनगुना के शायद
या नन्ही सी गिड़गिड़ाहट मिलाकर
पर ऐसे कहो
कि न कहना बचा रहे

रुको
थोड़ा सा और सोचो
अरे इतनी जल्दी नहीं रे
ज़रा हिम्मत और

ना समझने दो
फ़र्क़ नहीं पड़ा?
पड़ना ही नहीं था
बस कहना ज़रूरी था

मौक़ा जो खुद को दिया
उनके नाम पर

तस्वीरों में तलुए थे
कैसे जानोगे
जब देखोगे ही नहीं तो

देखो
धुँधली आँखों से ही सही
पोंछों अब ये भाप
नज़र साफ़ करो

क्या दिखा
बेवकूफियाँ और नादानियाँ ही ना
यही तो बचाना तय था

चलो अब मुस्कुराओ।

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...