Saturday, 30 September 2017

पछतावें

अनंत काल तक एक परछाई भटकेगी
हमारे संयुक्त पछतावों की परछाई
एक अर्थ हो सकता था प्यार का
एक दुनिया तोड़कर एक और दुनिया बनाई अपने आस-पास
अपने लिए
बना पाते एक दुनिया
एक-दूसरे के लिए भी

जहाँ आँसू भी खिल्ली उड़ाते हों
वहाँ डर ख़ुद-ब-ख़ुद चला आता है

अपने होने की तमाम जगहों को कम किया
अपने होने को कुछ और घटाया

जुड़े हुए हाथ अब तलक़ सलामत थे
बस प्रार्थनाएँ घायल हो चुकी थीं

खुशियों में खुशी ढूँढ़ी तो याद आया
आज छुट्टी थी,

ख़ैर !


रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...