Saturday, 26 March 2016

1.

खाल तक उधेड़कर 
नंगा करो
माँस को नोंचो
खुद को छीलों
नहीं बचने देगा
अपराधबोध !
देह नहीं आत्मा को बचाओ
उस बदसूरती को भी बचाओ
जो खूबसूरत की पहचान कराये
कितने करोगे क़त्ल !
अब ठहरो
उस बच्ची का चेहरा आँखों में भरो
जो रोज़ दे जाती है 
मुट्ठी भर सांसें
प्यार जितना
सारा खुद से
मुझमें ब्रह्माण्ड
हवा हूँ
पानी और आग भी
रात रात भर पीना इतना
कि कलेजा जलकर छलनी हो सके
हँसना ऐसे कि अंतड़ियाँ उबलकर
मुँह से बाहर आ सकें
नसों में जो तनाव है
उसे खोलो रे
कोई आओ 
हमें बचाओ
क्या कहीं कोई है 
जिस तक पहुँचती हो हमारी आवाज़
यूँ फड़कते होंठ 
पपडा कर झड़ जाएँगे एक दिन
एक अंतिम गीत वेदना का
आओ सुन लो
एक शाम यहीं गुज़ार लो
थोड़ी सी ज़िल्लत और सही !

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...