परिदृश्य में बस कुछ बिखरापन
जमीं से उगते हैं
आधा दर्ज़न हाथों के जोडें
कमरे की दीवारें कुछ और क़रीब खिसक आई हैं
सुराख़
फर्श पर ख़ून के धब्बे
हर तरफ सीलन और भीगापन
छत के पंखें के पास कुछ चेहरे जैसा उभरता है
कुछ दोस्तों की हँसी गूँजती है
बंद पड़ा रेडियो अचानक बज उठता है
कमरे में दरवाज़ा कोई नहीं
तो अंदर हूँ कैसे !
पहेलियाँ !
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