Wednesday, 12 August 2015

भरोसा

मैंने मेरे मन में
एक भरोसा पाला
उसे कभी क़ैद नहीं किया
वो जब-जब उड़ा फिर लौट आया
चिड़िया जैसे नन्हे पंख उगे
धरती के गुरुत्व के विरुद्ध पहली उड़ान
पहला लक्षण था आज़ादी की चाहना का
भरोसे के भीतर एक और भरोसा जन्मा
और ये सिलसिला चलता रहा
अब इनकी संख्या इतनी है
कि निराश होने के लिए
मुझे अपने हर भरोसे के
पंख मरोड़कर उन्हें अपाहिज बनाना होगा!
करना होगा क़ैद
जो मैं कर नहीं पाऊँगी
हैरानी ! मैं ऐसा सोच भी पाई
अपनी इस सोच पर बीती रात घंटों सोचा
खुद पर लानतें फेंकीं
कोसा खुद को
मन ग्लानि से भर उठा
आँखों के कोने भीगते गए
और फिर इकठ्ठा किया अपना सारा प्यार
उनके पँखों को सहलाया
हर एक भरोसे को पुचकारा
उनके सतरंगे पँखों को
आज़ादी के एहसास से भरते देखा
सुबह तक वे एक लम्बी उड़ान पर निकल चुके थे
उनकी अनुपस्थिति में
मैं निराश !
पर जान पा रही थी कि शाम तक वे लौट आएँगे
यह वह भरोसा है
जिसके पँख अभी उगने बाकी हैं
जो अभी ही है जन्मा !

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