Tuesday, 8 September 2015

इंद्रधनुषी झाग

अपनी एक टांग पर लटके
उधड़े हुए मुर्गों की तरह
खामोशी में डूबी दुनिया
बेतहाशा शोर से भरी है
ये दुनिया भरभराकर ढह रही है
ये दुनिया और कोई नहीं
हम हैं हम से है
हम वो प्रजाति हैं
जो ढहते हुए भी साँस ले रहे हैं
उनसे क्या ही कहा जाए
जिन्हें कहीं कुछ नहीं छूता !
किरचें
जो तस्वीर को हमेशा
अधूरा ही रखेंगी
चटके हुए कोने
 जो कभी नहीं जुड़ेंगे
शुरुआत कितनी सादा
पर कितनी प्यारी
फिर सब कितना जटिल
आशा और निराशा
एक ही बिंदु पर आ टिकी हैं
यह बिंदु हमारा नहीं
इतिहास हमारा नहीं
भविष्य भी हम नहीं
हम बस आज हैं
अभी इस पल हैं
अगले ही पल हमें
झटक दिया जाएगा
हम वो झाग हैं
जो खुद में
 एक पूरा इंद्रधनुष समेटे हैं
पर जिनका कोई आकाश नहीं !

6 comments:

  1. बहुत ही सारगर्भित कविता है अदिति, बधाई एवम् शुभकामनाएं

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    1. शुक्रिया प्रदीप ! :)

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    2. This comment has been removed by the author.

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  2. बहुत ही सारगर्भित कविता है अदिति, बधाई एवम् शुभकामनाएं

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  3. यह बिंदु हमारा नहीं
    इतिहास हमारा नहीं
    भविष्य भी हम नहीं
    हम बस आज हैं
    अभी इस पल हैं।
    अदिति जी यही सत्य है। उत्कृष्ट् रचना । अगली कि प्रतीक्षा रहेगी

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    1. बहुत शुक्रिया आपका ! :)

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