Saturday, 15 August 2015

घंटी, घुँघरू और गुलमोहर

बहता है क्या
ये जमा जमा सा
अटका था जो हलक में
खिड़की के बीचों बीच एक चेहरा था
चेहरे पर लकीरें
जमीं पर परछाईयाँ
सपनों की बढ़ती आबादी
कहा कुछ नहीं जा रहा
क्योंकि सुना नहीं जा सकता
निगलना और उगलना दोनों मुश्किल था
पर राह बन ही जाती है
पटरियों से तेज़ी से गुजर जाती है एक ट्रेन
कहाँ ले जायेगी
पुकारा गया था एक नाम
शोर से नसें दर्द करने लगी
बच्ची सुनाती है कविता
जिसमें मछली जल की रानी है
और याद एक खींची चली आती है
झूठ बोलने से रूठ जाती थी विद्या माँ
और चढ़ता था पाप
पाप और पुण्य जो भी रहा
सब बह गया
दो के पहाड़े से शुरू हुआ हिसाब
सब शून्य हो गया
अंदर से बाहर आते हुए खौफ था
बाहर से अंदर जाते बेचैनी
कहीं बीच ही में रोक लिया जाए
बस पुकार लिया जाए
आवाज़ कोई नहीं आती
घर बस एक शब्द नहीं है
वहां से साँसों की घंटिया सुनाई देती हैं
घंटी से घूँघरूओं का  क्या रिश्ता है
और मेरा गुलमोहर से
बिखरी हुई पत्तियों में  दर्शन
और लिखे हुए में अर्थ ढूँढना
कितना बेमानी है
रात कहीं अंताक्षरी रहे थे खेल
म पर आकर अटक गया संगीत
एक धुन कहीं से देती थी सुनाई
उसपर बोल अभी लिखे नहीं गए
पुराने को अपदस्थ कर
नए शब्दों का  निर्माण होगा
नोंचना और खुरचना कितने नापसंद हैं मुझे ये शब्द
सुनकर ही कैसा सा लगता है
धुन पर कुछ बोल हैं देते सुनाई
फूलकुमारी हँस रही है
जॉनी के झूठ पर हँस देते हैं पापा
रात जकड़ती जाती है
बातें कहीं नहीं
बस शोर !
लाशों का ढेर है
चलती फिरती
 कोई जीवन जन्म नहीं लेता इस शहर में
जन्मती हैं लाशें
सपनें उनमें जान फूँकते हैं
और खुद सो जाते हैं
पाश ने किसी जकड़ती रात ही में कहा होगा
सबसे खतरनाक है किसी के सपनों का मर जाना !

No comments:

Post a Comment

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...