Saturday, 2 January 2016

पहेलियाँ

परिदृश्य में बस कुछ बिखरापन

जमीं से उगते हैं 
आधा दर्ज़न हाथों के जोडें
कमरे की दीवारें कुछ और क़रीब खिसक आई हैं
सुराख़
फर्श पर ख़ून के धब्बे 
हर तरफ सीलन और भीगापन
छत के पंखें के पास कुछ चेहरे जैसा उभरता है
कुछ दोस्तों की हँसी गूँजती है
बंद पड़ा रेडियो अचानक बज उठता है
कमरे में दरवाज़ा कोई नहीं
तो अंदर हूँ कैसे ! 

पहेलियाँ !

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