Friday, 19 May 2017

सिमोन


बाइबल नहीं तुम्हारा लिखा
क्योंकि धर्म में कुछ श्रेष्ठ नहीं हमारे लिए
कहते हैं एक उम्र के बाद पुरुष की कठोरता टूट जाती है
वह तलाशता है अपने दंभ को सहलाने वाला हाथ
और स्त्रियाँ ना झुकने का फैसला करती है
जिनकी कमर पर आजीवन घन बजा हो

किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर
कोई दुर्घटना हो और चौथे माले से 
ढहने लगे सब ईंटें
ऐसे बरसते थे शब्द
जैसे स्वादिष्ट भोजन के बाद
गले में अटका रह गया हो
एक सूक्ष्म-सा रेशा
एक कोमल सी पलक मुड़कर धंस गयी हो आँख में
शूल की तरह
बातों का अंत

यूँ सोच पर बरसते रहे कोड़े लगातार
जो करना था उसे सोच में इतना झुठलाया कि
झूठ सच हो गया

और सच ये है कि
पिता से प्रेम पर चर्चा नहीं हो सकती

रात भर बाथरूम से
पानी के बहने की आवाज़ आई
रात भर खून बहा नालियों में
दो टाँगों के बीच सिमटता रहा अस्तित्व
और मृत्यु फिर मुस्कुराई

तुम जानती हो सिमोन
कॉलेज में तुम्हें पढ़कर
तुम्हारी तस्वीर देखी नेट पर
और अपना कवर लगा लिया
तुम कोई सहेली लगी
तुम्हारे नाम से छद्म नारीवाद के ताने भी सुने
लेकिन गर्व से
तुम मेरा गर्व रही

दुनिया की हर महत्वपूर्ण घटना से दूर
ज़मीं में कहीं भीतर
कहीं भी उपस्थित ना होकर
मैंने खुद को उगते हुए देखा.


3 comments:

  1. आधुनिक सच्चाई को उजागर किया
    मर्मात्मक भावात्मक post

    ReplyDelete
  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...