सब कुछ छोटा है
छोटा दरवाज़ा
छोटी खिड़की
छोटा आदमी
छोटी सोच
कब होगा सब बड़ा
इतना बड़ा
जिसमें से
झुककर ना गुज़रना पड़े।
छोटा दरवाज़ा
छोटी खिड़की
छोटा आदमी
छोटी सोच
कब होगा सब बड़ा
इतना बड़ा
जिसमें से
झुककर ना गुज़रना पड़े।
मैं जहां भी गई भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...
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